15/08/2026
सवाल जवाबदेही का है…
जब इन इलेक्ट्रिक बसों की ग्राउंड क्लीयरेंस ही पहाड़ी सड़कों के हिसाब से पर्याप्त नहीं थी, तो इन्हें खरीदने की प्रक्रिया में आगे क्यों बढ़ाया गया?
जब बसों को ऑन-ट्रायल अलग-अलग रूटों पर भेजा गया, तो उन ट्रायल की रिपोर्ट में क्या-क्या कमियां सामने आईं?
और अगर कमियां सामने आई थीं, तो किस अधिकारी या तकनीकी टीम ने इन बसों को ओके रिपोर्ट दी?
आज स्थिति यह है कि खराब और ऊबड़-खाबड़ सड़क पर बस का निचला हिस्सा सड़क से लग रहा है।
तो सवाल सिर्फ बस का नहीं है—उस प्रक्रिया का है जिसके तहत करोड़ों रुपये की बसों को पहाड़ी रूटों के लिए उपयुक्त माना गया।
क्या ट्रायल रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी?
क्या यह बताया जाएगा कि किसने फिटनेस/तकनीकी स्वीकृति दी और उसकी जिम्मेदारी क्या तय होगी?
जनता के पैसे से खरीदी गई बसों में अगर शुरुआत से ही तकनीकी कमी थी, तो जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
सवाल करना विरोध नहीं, व्यवस्था को बेहतर बनाने की कोशिश है।
Hrtc Keylong Mandi Himbus