12/09/2026
अनमोल
चिट्ठीसंध्या का समय था। बूढ़े रमेश बाबू अपनी पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर बैठे थे। उनके हाथ में एक पीला पड़ चुका लिफाफा था। यह लिफाफा उनकी दिवंगत पत्नी सुमित्रा ने बीस साल पहले लिखा था।रमेश बाबू का इकलौता बेटा राहुल शहर में एक बड़ा इंजीनियर बन गया था। उसके पास गाड़ी थी, बड़ा बंगला था, लेकिन अपने बूढ़े पिता के लिए दो वक्त की बात करने का समय नहीं था। राहुल हमेशा यही कहता था, "पापा, जिंदगी बहुत व्यस्त है। आप भी शहर आ जाइए, यहाँ आपका मन लग जाएगा।"लेकिन रमेश बाबू अपना पुराना गाँव और वो घर नहीं छोड़ना चाहते थे जहाँ उन्होंने सुमित्रा के साथ अपनी जिंदगी के सबसे हसीन पल बिताए थे।आखिरी खत का सचउस शाम, रमेश बाबू ने कांपते हाथों से वह पुराना लिफाफा खोला। अंदर सुमित्रा की सुंदर लिखावट में एक चिट्ठी थी:
"मेरे प्यारे रमेश,अगर तुम यह खत पढ़ रहे हो, तो इसका मतलब है कि मैं जा चुकी हूँ। मुझे तुम्हारी और राहुल की सबसे अधिक चिंता है। राहुल बड़ा होकर शहर जाएगा, पैसे कमाएगा, लेकिन ध्यान रखना कि वह कहीं अपनों की भीड़ में अकेला न हो जाए। उसे याद दिलाना कि सफलता की ऊँचाइयाँ कभी भी रिश्तों की गर्माहट से बड़ी नहीं होतीं। और रमेश... तुम कभी खुद को अकेला मत समझना। मेरी यादें हमेशा तुम्हारे साथ हैं।"
चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते रमेश बाबू की आँखों से आँसू छलक आए। तभी दरवाजे पर गाड़ी के हॉर्न की आवाज़ आई। राहुल आया था, इस बार वह कुछ दिनों के लिए रुका था। उसने आकर पिता के पैर छुए। राहुल की आँखें कुछ थकी हुई थीं और चेहरे पर तनाव था।बदलाव की एक नई सुबहरमेश बाबू ने बिना कुछ कहे राहुल के हाथ में वह पुरानी चिट्ठी थमा दी। राहुल ने हैरान होकर खत पढ़ा। जैसे-जैसे उसकी नज़रें शब्दों पर गईं, उसका गला रुंध गया। उसे याद आया कि कैसे वह बचपन में अपने पिता की उंगली पकड़कर इसी आँगन में दौड़ा करता था। उसने पैसे और भागदौड़ की अंधी दौड़ में उस इंसान को भुला दिया था, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी उसे काबिल बनाने में काट दी थी।राहुल की आँखों से भी आँसू बह निकले। उसने खत को सीने से लगाया और रमेश बाबू को कसकर गले लिया। उसने कहा, "पापा, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं गाड़ी और पैसों के पीछे भागते-भागते बहुत दूर निकल आया था। अब मैं कहीं नहीं जाऊंगा। हम यहीं रहेंगे, साथ में।"उस शाम, उस पुराने घर में दो लोग नहीं, बल्कि दो टूटे हुए दिल फिर से जुड़ गए थे।