SHREE Lalitamba Packaging industries

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28/12/2025

भारतीय पञ्चाङ्ग की वैज्ञानिकता

'पंचांग' भारतीयों द्वारा माना जाने वाला वैज्ञानिक कैलेंडर है।

पंचांग (पंच + अंग = पांच अंग) वैदिक काल-गणना की रीति से निर्मित पारम्परिक कैलेण्डर या कालदर्शक को कहते हैं।
पंचांग नाम पाँच प्रमुख भागों से बने होने के कारण है, यह है- तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण।
वैदिक गणना के आधार पर पंचांग की तीन धाराएँ हैं-
पहली चंद्र आधारित, दूसरी नक्षत्र आधारित और तीसरी सूर्य आधारित पद्धति।

एक साल में १२ महीने होते हैं। प्रत्येक महीने में १५ दिन के दो पक्ष होते हैं- शुक्ल और कृष्ण। प्रत्येक साल में दो अयन होते हैं। इन दो अयनों की राशियों में २७ नक्षत्र भ्रमण करते रहते हैं। १२ मास का एक वर्ष और ७ दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से शुरू हुआ। महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पर रखा जाता है। यह १२ राशियाँ बारह सौर मास हैं। जिस दिन सूर्य जिस राशि मे प्रवेश करता है उसी दिन की संक्रांति होती है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा जिस नक्षत्र मे होता है उसी आधार पर महीनों का नामकरण हुआ है। चंद्र वर्ष, सौर वर्ष से ११ दिन ३ घड़ी ४८ पल छोटा है। इसीलिए हर ३ वर्ष मे इसमे एक महीना जोड़ दिया जाता है जिसे अधिक मास कहते हैं।

== तिथि ==15/12/1990

एक दिन को तिथि कहा गया है जो पंचांग के आधार पर उन्नीस घंटे से लेकर चौबीस घंटे तक की होती है। चंद्र मास में ३० तिथियाँ होती हैं, जो दो पक्षों में बँटी हैं। शुक्ल पक्ष में एक से चौदह और फिर पूर्णिमा आती है। पूर्णिमा सहित कुल मिलाकर पंद्रह तिथि। कृष्ण पक्ष में एक से चौदह और फिर अमावस्या आती है। अमावस्या सहित पंद्रह तिथि।

तिथियों के नाम निम्न हैं- पूर्णिमा (पूरनमासी),
प्रतिपदा (पड़वा),
द्वितीया (दूज),
तृतीया (तीज),
चतुर्थी (चौथ),
पंचमी (पंचमी),
षष्ठी (छठ),
सप्तमी (सातम),
अष्टमी (आठम),
नवमी (नौमी),
दशमी (दसम),
एकादशी (ग्यारस),
द्वादशी (बारस),
त्रयोदशी (तेरस),
चतुर्दशी (चौदस)
और अमावस्या (अमावस)।

== वार == day एक सप्ताह में सात दिन होते हैं:-
सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार, शनिवार और रविवार

== नक्षत्र ==14!40

आकाश में तारामंडल के विभिन्न रूपों में दिखाई देने वाले आकार को नक्षत्र कहते हैं। मूलत: नक्षत्र 27 माने गए हैं।
ज्योतिषियों द्वारा एक अन्य अभिजित नक्षत्र भी माना जाता है। चंद्रमा उक्त सत्ताईस नक्षत्रों में भ्रमण करता है। नक्षत्रों के नाम नीचे चंद्रमास में दिए गए हैं-

== योग ==40!36
योग 27 प्रकार के होते हैं। सूर्य-चंद्र की विशेष दूरियों की स्थितियों को योग कहते हैं।
दूरियों के आधार पर बनने वाले 27 योगों के नाम क्रमश: इस प्रकार हैं:-
विष्कुम्भ, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, सुकर्मा, धृति, शूल, गण्ड, वृद्धि, ध्रुव, व्याघात, हर्षण, वज्र, सिद्धि, व्यातीपात, वरीयान, परिघ, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, इन्द्र और वैधृति।

27 योगों में से कुल 9 योगों को अशुभ माना जाता है तथा सभी प्रकार के शुभ कामों में इनसे बचने की सलाह दी गई है। ये अशुभ योग हैं:-
विष्कुम्भ, अतिगण्ड, शूल, गण्ड, व्याघात, वज्र, व्यतीपात, परिघ और वैधृति

== करण ==24!55
एक तिथि में दो करण होते हैं- एक पूर्वार्ध में तथा एक उत्तरार्ध में। कुल 11 करण होते हैं- बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि, शकुनि, चतुष्पाद, नाग और किस्तुघ्न। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (14) के उत्तरार्ध में शकुनि, अमावस्या के पूर्वार्ध में चतुष्पाद, अमावस्या के उत्तरार्ध में नाग और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के पूर्वार्ध में किस्तुघ्न करण होता है। विष्टि करण को भद्रा कहते हैं। भद्रा में शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं।

== पक्ष ==
प्रत्येक महीने में तीस दिन होते हैं। तीस दिनों को चंद्रमा की कलाओं के घटने और बढ़ने के आधार पर दो पक्षों यानी शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में विभाजित किया गया है।
एक पक्ष में लगभग पंद्रह दिन या दो सप्ताह होते हैं। एक सप्ताह में सात दिन होते हैं। शुक्ल पक्ष में चंद्र की कलाएँ बढ़ती हैं और कृष्ण पक्ष में घटती हैं।

== महीनों के नाम ==इन बारह मासों के नाम आकाशमण्डल के नक्षत्रों में से १२ नक्षत्रों के नामों पर रखे गये हैं।
जिस मास जो नक्षत्र आकाश में प्रायः रात्रि के आरम्भ से अन्त तक दिखाई देता है या कह सकते हैं कि जिस मास की पूर्णमासी को चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसी के नाम पर उस मास का नाम रखा गया है।

चित्रा नक्षत्र के नाम पर चैत्र मास (मार्च-अप्रैल),
विशाखा नक्षत्र के नाम पर वैशाख मास (अप्रैल-मई),
ज्येष्ठा नक्षत्र के नाम पर ज्येष्ठ मास (मई-जून),
आषाढ़ा नक्षत्र के नाम पर आषाढ़ मास (जून-जुलाई),
श्रवण नक्षत्र के नाम पर श्रावण मास (जुलाई-अगस्त),

भाद्रपद (भाद्रा) नक्षत्र के नाम पर भाद्रपद मास (अगस्त-सितम्बर),
अश्विनी के नाम पर आश्विन मास (सितम्बर-अक्टूबर),
कृत्तिका के नाम पर कार्तिक मास (अक्टूबर-नवम्बर),
मृगशीर्ष के नाम पर मार्गशीर्ष (नवम्बर-दिसम्बर),
पुष्य के नाम पर पौष (दिसम्बर-जनवरी),
मघा के नाम पर माघ (जनवरी-फरवरी) तथा फाल्गुनी नक्षत्र के नाम पर फाल्गुन मास (फरवरी-मार्च) का नामकरण हुआ है।

महीनों के नाम पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा इस नक्षत्र होता है
चैत्र चित्रा, स्वाति
वैशाख विशाखा, अनुराधा
ज्येष्ठ ज्येष्ठा, मूल
आषाढ़ पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़
श्रावण श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा
भाद्रपद पूर्वभाद्र, उत्तरभाद्र
आश्विन रेवती, अश्विन, भरणी
कार्तिक कृतिका, रोहणी
मार्गशीर्ष मृगशिरा, आर्द्रा
पौष पुनवर्सु, पुष्य
माघ अश्लेशा, मघा
फाल्गुन पूर्व फाल्गुन, उत्तर फाल्गुन, हस्त

== सौरमास =
सौरमास का आरम्भ सूर्य की संक्रांति से होता है। सूर्य की एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति का समय सौरमास कहलाता है।
यह मास प्राय: तीस, इकतीस दिन का होता है। कभी-कभी अट्ठाईस और उन्तीस दिन का भी होता है। मूलत: सौरमास (सौर-वर्ष) 365 दिन का होता है।

12 राशियों को बारह सौरमास माना जाता है। जिस दिन सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है उसी दिन की संक्रांति होती है।
इस राशि प्रवेश से ही सौरमास का नया महीना ‍शुरू माना गया है। सौर-वर्ष के दो भाग हैं- उत्तरायण छह माह का और दक्षिणायन भी छह मास का। जब सूर्य उत्तरायण होता है तब धर्म अनुसार यह तीर्थ यात्रा व उत्सवों का समय होता है। पुराणों अनुसार अश्विन, कार्तिक मास में तीर्थ का महत्व बताया गया है। उत्तरायण के समय पौष-माघ मास चल रहा होता है।

मकर संक्रांति के दिन सूर्य उत्तरायण होता है जबकि सूर्य धनु से मकर राशि में प्रवेश करता है। सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करता है तब सूर्य दक्षिणायन होता है। दक्षिणायन व्रतों का और उपवास का समय होता है जबकि चंद्रमास अनुसार अषाढ़ या श्रावण मास चल रहा होता है। व्रत से रोग और शोक मिटते हैं। दक्षिणायन में विवाह और उपनयन आदि संस्कार वर्जित है, जब कि अग्रहायण मास में ये सब किया जा सकता है अगर सूर्य वृश्चिक राशि में हो। और उत्तरायण सौर मासों में मीन मास मै विवाह वर्जित है।

सौरमास के नाम : मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्‍चिक, धनु, मकर, कुंभ, मीन।

सूर्य के धनुसंक्रमण से मकरसंक्रमण तक मकर राशी में रहता हे। इसे धनुर्मास कहते है। इस माह का धार्मिक जगत में विशेष महत्व है।

== चंद्रमास == चंद्रमा की कला की घट-बढ़ वाले दो पक्षों (कृष्‍ण और शुक्ल) का जो एक मास होता है वही चंद्रमास कहलाता है। यह दो प्रकार का शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होकर अमावस्या को पूर्ण होने वाला 'अमांत' मास मुख्‍य चंद्रमास है। कृष्‍ण प्रतिपदा से 'पूर्णिमात' पूरा होने वाला गौण चंद्रमास है। यह तिथि की घट-बढ़ के अनुसार 29, 30 व 28 एवं 27 दिनों का भी होता है।

पूर्णिमा के दिन, चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है उसी आधार पर महीनों का नामकरण हुआ है। सौर-वर्ष से 11 दिन 3 घटी 48 पल छोटा है चंद्र-वर्ष इसीलिए हर 3 वर्ष में इसमें 1 महीना जोड़ दिया जाता है।

सौरमास 365 दिन का और चंद्रमास 355 दिन का होने से प्रतिवर्ष 10 दिन का अंतर आ जाता है। इन दस दिनों को चंद्रमास ही माना जाता है। फिर भी ऐसे बड़े हुए दिनों को 'मलमास' या 'अधिमास' कहते हैं।

चंद्रमास के नाम : चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ तथा फाल्गुन। (नौमी), दशमी (दसम), एकादशी (ग्यारस), द्वादशी (बारस), त्रयोदशी (तेरस), चतुर्दशी (चौदस) और अमावस्या (अमावस)।

== वार ==setrday एक सप्ताह में सात दिन होते हैं:-सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार, शनिवार और रविवार

== नक्षत्र ==14!40

आकाश में तारामंडल के विभिन्न रूपों में दिखाई देने वाले आकार को नक्षत्र कहते हैं। मूलत: नक्षत्र 27 माने गए हैं। ज्योतिषियों द्वारा एक अन्य अभिजित नक्षत्र भी माना जाता है। चंद्रमा उक्त सत्ताईस नक्षत्रों में भ्रमण करता है। नक्षत्रों के नाम नीचे चंद्रमास में दिए गए हैं-

== योग ==40!36 योग 27 प्रकार के होते हैं। सूर्य-चंद्र की विशेष दूरियों की स्थितियों को योग कहते हैं। दूरियों के आधार पर बनने वाले 27 योगों के नाम क्रमश: इस प्रकार हैं:- विष्कुम्भ, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, सुकर्मा, धृति, शूल, गण्ड, वृद्धि, ध्रुव, व्याघात, हर्षण, वज्र, सिद्धि, व्यातीपात, वरीयान, परिघ, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, इन्द्र और वैधृति।

27 योगों में से कुल 9 योगों को अशुभ माना जाता है तथा सभी प्रकार के शुभ कामों में इनसे बचने की सलाह दी गई है। ये अशुभ योग हैं: विष्कुम्भ, अतिगण्ड, शूल, गण्ड, व्याघात, वज्र, व्यतीपात, परिघ और वैधृति

== करण ==24!55 एक तिथि में दो करण होते हैं- एक पूर्वार्ध में तथा एक उत्तरार्ध में। कुल 11 करण होते हैं- बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि, शकुनि, चतुष्पाद, नाग और किस्तुघ्न। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (14) के उत्तरार्ध में शकुनि, अमावस्या के पूर्वार्ध में चतुष्पाद, अमावस्या के उत्तरार्ध में नाग और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के पूर्वार्ध में किस्तुघ्न करण होता है। विष्टि करण को भद्रा कहते हैं। भद्रा में शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं।

== पक्ष ==sukl pakch प्रत्येक महीने में तीस दिन होते हैं। तीस दिनों को चंद्रमा की कलाओं के घटने और बढ़ने के आधार पर दो पक्षों यानी शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में विभाजित किया गया है। एक पक्ष में लगभग पंद्रह दिन या दो सप्ताह होते हैं। एक सप्ताह में सात दिन होते हैं। शुक्ल पक्ष में चंद्र की कलाएँ बढ़ती हैं और कृष्ण पक्ष में घटती हैं।

== महीनों के नाम ==desmbar इन बारह मासों के नाम आकाशमण्डल के नक्षत्रों में से १२ नक्षत्रों के नामों पर रखे गये हैं। जिस मास जो नक्षत्र आकाश में प्रायः रात्रि के आरम्भ से अन्त तक दिखाई देता है या कह सकते हैं कि जिस मास की पूर्णमासी को चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसी के नाम पर उस मास का नाम रखा गया है। चित्रा नक्षत्र के नाम पर चैत्र मास (मार्च-अप्रैल), विशाखा नक्षत्र के नाम पर वैशाख मास (अप्रैल-मई), ज्येष्ठा नक्षत्र के नाम पर ज्येष्ठ मास (मई-जून), आषाढ़ा नक्षत्र के नाम पर आषाढ़ मास (जून-जुलाई), श्रवण नक्षत्र के नाम पर श्रावण मास (जुलाई-अगस्त), भाद्रपद (भाद्रा) नक्षत्र के नाम पर भाद्रपद मास (अगस्त-सितम्बर), अश्विनी के नाम पर आश्विन मास (सितम्बर-अक्टूबर), कृत्तिका के नाम पर कार्तिक मास (अक्टूबर-नवम्बर), मृगशीर्ष के नाम पर मार्गशीर्ष (नवम्बर-दिसम्बर), पुष्य के नाम पर पौष (दिसम्बर-जनवरी), मघा के नाम पर माघ (जनवरी-फरवरी) तथा फाल्गुनी नक्षत्र के नाम पर फाल्गुन मास (फरवरी-मार्च) का नामकरण हुआ है।

महीनों के नाम पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा इस नक्षत्र होता है
चैत्र चित्रा, स्वाति
वैशाख विशाखा, अनुराधा
ज्येष्ठ ज्येष्ठा, मूल
आषाढ़ पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़
श्रावण श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा
भाद्रपद पूर्वभाद्र, उत्तरभाद्र
आश्विन रेवती, अश्विन, भरणी
कार्तिक कृतिका, रोहणी
मार्गशीर्ष मृगशिरा, आर्द्रा
पौष पुनवर्सु, पुष्य
माघ अश्लेशा, मघा
फाल्गुन पूर्व फाल्गुन, उत्तर फाल्गुन, हस्त
== सौरमास ==magseer सौरमास का आरम्भ सूर्य की संक्रांति से होता है। सूर्य की एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति का समय सौरमास कहलाता है। यह मास प्राय: तीस, इकतीस दिन का होता है। कभी-कभी अट्ठाईस और उन्तीस दिन का भी होता है। मूलत: सौरमास (सौर-वर्ष) 365 दिन का होता है।

12 राशियों को बारह सौरमास माना जाता है। जिस दिन सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है उसी दिन की संक्रांति होती है। इस राशि प्रवेश से ही सौरमास का नया महीना ‍शुरू माना गया है। सौर-वर्ष के दो भाग हैं- उत्तरायण छह माह का और दक्षिणायन भी छह मास का। जब सूर्य उत्तरायण होता है तब हिंदू धर्म अनुसार यह तीर्थ यात्रा व उत्सवों का समय होता है। पुराणों अनुसार अश्विन, कार्तिक मास में तीर्थ का महत्व बताया गया है। उत्तरायण के समय पौष-माघ मास चल रहा होता है।

मकर संक्रांति के दिन सूर्य उत्तरायण होता है जबकि सूर्य धनु से मकर राशि में प्रवेश करता है। सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करता है तब सूर्य दक्षिणायन होता है। दक्षिणायन व्रतों का और उपवास का समय होता है जबकि चंद्रमास अनुसार अषाढ़ या श्रावण मास चल रहा होता है। व्रत से रोग और शोक मिटते हैं। दक्षिणायन में विवाह और उपनयन आदि संस्कार वर्जित है, जब कि अग्रहायण मास में ये सब किया जा सकता है अगर सूर्य वृश्चिक राशि में हो। और उत्तरायण सौर मासों में मीन मास मै विवाह वर्जित है।

सौरमास के नाम : मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्‍चिक, धनु, मकर, कुंभ, मीन।

सूर्य के धनुसंक्रमण से मकरसंक्रमण तक मकर राशी में रहता हे। इसे धनुर्मास कहते है। इस माह का धार्मिक जगत में विशेष महत्व है।

== चंद्रमास ==magseer चंद्रमा की कला की घट-बढ़ वाले दो पक्षों (कृष्‍ण और शुक्ल) का जो एक मास होता है वही चंद्रमास कहलाता है। यह दो प्रकार का शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होकर अमावस्या को पूर्ण होने वाला 'अमांत' मास मुख्‍य चंद्रमास है। कृष्‍ण प्रतिपदा से 'पूर्णिमात' पूरा होने वाला गौण चंद्रमास है। यह तिथि की घट-बढ़ के अनुसार 29, 30 व 28 एवं 27 दिनों का भी होता है।

पूर्णिमा के दिन, चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है उसी आधार पर महीनों का नामकरण हुआ है। सौर-वर्ष से 11 दिन 3 घटी 48 पल छोटा है चंद्र-वर्ष इसीलिए हर 3 वर्ष में इसमें 1 महीना जोड़ दिया जाता है।

सौरमास 365 दिन का और चंद्रमास 355 दिन का होने से प्रतिवर्ष 10 दिन का अंतर आ जाता है। इन दस दिनों को चंद्रमास ही माना जाता है। फिर भी ऐसे बड़े हुए दिनों को 'मलमास' या 'अधिमास' कहते हैं।

चंद्रमास के नाम : चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ तथा फाल्गुन।
✍🏻साभार

08/12/2025

*‼ श्रीर्जयति ‼*

*ह्र्दय_विचार*
श्री भगवत्या: राजराजेश्वर्या:
चक्षुर्दद्यान्मनो दद्यात्
वाचं दद्याच्च सूनृताम्।
अनुव्रजेदुपासीत
स यज्ञ: पंचदक्षिण:।।

घर आये हुए अतिथि को प्रसन्न दृष्टि से देखना चाहिए, मन से उनकी सेवा करनी चाहिए, उनसे मधुर और सत्य वाणी बोलनी चाहिए, जब तक अतिथि रहें उनकी सेवा में लगा रहना चाहिए और जब जाने लगें तो उनके पीछे कुछ दूर तक जाना चाहिए - यह पाँच कार्य मनुष्य का पाँच प्रकार की दक्षिणा से युक्त यज्ञ है।

मानव जीवन का सबसे सूक्ष्म और कठिन प्रश्न यही है—कौन हमारा अपना है? और इस अपनत्व का माप किससे होता है? अक्सर लोग संबंधों का वर्णन करने में बड़े-बड़े शब्दों, वादों और भावनात्मक प्रदर्शन का प्रयोग करते हैं, परन्तु जीवन का गूढ़ अनुभव यही कहता है कि अपनत्व का मूल्य ज़िक्र से नहीं, फिक्र से जाना जाता है। शब्दों की दुनिया बेहद विशाल और आकर्षक है, पर हृदय की सच्चाई केवल व्यवहार की कठोर कसौटी पर ही जानी जाती है।

वस्तुतः मनुष्य का स्वभाव ऐसा है कि वह बाहरी प्रदर्शन से मोहग्रस्त हो जाता है। कोई हमारे लिए मधुर शब्द कह दे, सम्मान दिखा दे, तो हमें लगता है यही हमारा ‘सच्चा अपना’ है। परन्तु सच्चे संबंधों की पहचान कठिन समय में, समस्या की घड़ी में, मन की बेचैनी में, और जीवन के अंधकारमय क्षणों में खुलती है। जहाँ केवल शब्द हों, वहाँ संबंध कागज़ की नाव की तरह होते हैं—पहले ही लहर में बह जाते हैं। पर जहाँ फिक्र हो, वहाँ भले शब्द मौन हों, लेकिन मन का स्नेह अपने व्यवहार से एक दीपक की तरह अंधेरे में भी दिशा देता है।

फिक्र का अर्थ मात्र चिंता नहीं; इसका विस्तार बहुत व्यापक है। फिक्र वह अदृश्य ऊर्जा है जो व्यक्ति को हमारे लिए प्रयास करने पर प्रेरित करती है। यह वह आंतरिक दायित्व है जिसे कोई नियम, कोई रिश्ता, कोई अपेक्षा बाध्य नहीं करती; यह हृदय की सहज संवेदना से उत्पन्न होती है। जो वास्तव में अपना होता है, वह परिस्थितियों से हार नहीं मानता; वह व्यस्तता का बहाना नहीं बनाता; वह दूरी के बावजूद समीप बना रहता है। उसका अपनत्व शब्दों में नहीं, बल्कि उन छोटे-छोटे कार्यों में झलकता है—एक संदेश, एक स्पर्श, एक सहयोग, एक मौन उपस्थिति, या बिना कहे समझ लेने की क्षमता।

जीवन में यह पहचानना भी आवश्यक है कि समय ही हर संबंध की कसौटी है। समय बताएगा कि किसने हमारी सफलता पर तालियाँ ही बजाईं और किसने हमारी कठिनाइयों में हाथ थामा। किसने केवल कहा कि “मैं हूँ” और किसने वास्तव में हमारे साथ रहकर यह कहा—“मैं था, मैं हूँ और मैं रहूँगा।” ज़िक्र में अक्सर अहं का विस्तार होता है, लेकिन फिक्र में हृदय का विस्तार होता है। ज़िक्र में दिखावा है, फिक्र में दायित्व है; ज़िक्र में आकर्षण है, फिक्र में आत्मीयता है; ज़िक्र क्षणिक है, फिक्र शाश्वत।

मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी समझ यही है कि हमें उन लोगों को पहचानना चाहिए जो हमारे लिए अपनी सुविधा से ऊपर उठकर आते हैं। क्योंकि वही हमारे जीवन की वास्तविक पूँजी हैं। रिश्तों को शब्दों से परखा जाए तो हम भ्रम में रह जाएँगे, पर उन्हें फिक्र से परखें तो उनकी असलियत स्वयं प्रकट हो जाएगी।

अंततः, अपनत्व कोई घोषणा नहीं, बल्कि एक निरंतर आचरण है। यह यह बताता नहीं, बल्कि दिखाता है। और यही जीवन का अपरिहार्य सत्य है—जो अपना है, वह ज़िक्र नहीं करता; वह फिक्र करता है।

सभी के सद्कर्म और भगवद्नाम स्मरण सहायक हों
प्रभु श्रीजी महाराज आपका सर्वमङ्गल करें।
*꧁!! जय श्रीजी की !!꧂*
*꧁!! जय शिवशम्भु !!꧂*

11/07/2024

Require bakery packaging distributors all over India
Whattsapp no 8222911967

🌹🙏 ॐ महाबलाय वीराय चिरंजीवीन उद्दते। हारिणे वज्र देहाय चोलंघितममहाव्ये।।🙏🌹
23/04/2024

🌹🙏 ॐ महाबलाय वीराय चिरंजीवीन उद्दते। हारिणे वज्र देहाय चोलंघितममहाव्ये।।🙏🌹

06/04/2024

37 signatures are needed, let’s get there by the end of the day?

17/02/2024
11/10/2023

Require lifafa machine operator in kundli. Sonipat

06/09/2023
SBS  WINDOW  BOX8-8-5// 10-10-5// 8-8-8// 10-10-8
22/06/2023

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