मिशन उत्तर प्रदेश

मिशन उत्तर प्रदेश हिन्दुत्व राष्ट्र की संचेतना है।

25/03/2026
03/12/2025

एक बात समझ नहीं आ रही कि यूरेशिया से आए पंडित जी SIR से नहीं डर रहे दनादन कागज दिखा रहे😁पर ये लाल किला कुतुबमीनार ताजमहल के मालिकों की गांड क्यों फटी जा रही है पेंचो 😂😂😂

Eyes on Mahakumbh
31/01/2025

Eyes on Mahakumbh

चार जून का  नजारा :जैसे जैसे दिन चढ़ रहा होगा भाजपा की टैली 150 के आसपास जा रही होगी। अनपढ़ प्रधानमंत्री मोदी , तड़ीपार ...
26/05/2024

चार जून का नजारा :

जैसे जैसे दिन चढ़ रहा होगा भाजपा की टैली 150 के आसपास जा रही होगी। अनपढ़ प्रधानमंत्री मोदी , तड़ीपार गृहमंत्री अमित शाह को अपने ऑफिस में बुलाकर बेल्टे बेल्ट ट्रीटमेंट दे रहे होंगे। मोटा गड़करी आरएसएस कार्यालय में छुपकर अपनी जान बचा रहा होगा।

उत्तर प्रदेश में 65 सीट जीतकर सपा कांग्रेस की सबसे बड़ी सहयोगी दल बनकर उभर रही होगी। राहुल गांधी किसी प्रकार के पद के लिए मना कर देंगे। प्रियंका गांधी अखिलेश भैया को प्रधानमंत्री पद सम्भालने के लिए कॉल कर रही होंगी।

डिंपल भाभी भैया को तिलक करेंगी और उनका कर्तव्य याद दिलायेंगी। छोटे नेताजी अखिलेश यादव अपना मंत्रालय प्लान बनाना स्टार्ट करेंगे।

राष्ट्रपति - जनाब आज़म खाँ
प्रधानमंत्री - अखिलेश यादव
गृहमंत्री - मल्लीकार्जुन खड़गे
शिक्षा मंत्री - उमर ख़ालिद
स्वास्थ्य मंत्री - सुप्रिया श्रीनेत
सड़क एवं परिवहन मंत्री - मीसा भारती
वितमंत्री- रघुराम राजन
रक्षा मंत्री - डिंपल भाभी
विदेश मंत्री- डॉक्टर कन्हैया कुमार
कानून मंत्री - क़ानूनविद् तेजस्वी यादव
पर्यटन मंत्री - रोहिणी आचार्य

बाक़ी मंत्रालय रवीश जी , अभिसार शर्मा, अजीत अंजुम , ध्रुव राठी जी जैसे देशभक्त लोगों से विचार विमर्श करके फ़ाइनल किए जाएँगे।

शाम तक हर शान्तिप्रिय मुहल्लों में बिरयानी की देग चढ़ी होगी। यादव टोले में भैंस आज दो लीटर ज्यादा दूध देंगी। बाभन , बनिया , ठाकुरों के मुहल्ले में सन्नाटा पसरा होगा । 😍

तेल लगाकर सरसो का।हिसाब कर दिया बरसों का ।।
22/01/2024

तेल लगाकर सरसो का।
हिसाब कर दिया बरसों का ।।

10/10/2022

कायदे से हक तो मुसलमानों का ही है उनपर!
हम तो बस मर्माहत परिवार को सांत्वना ही देने के अधिकारी हैं।

10/10/2022

गए मुलायम... काशीराम,
रह गया बाकी
🚩🚩जय श्री राम🚩🚩

'मथुरा भी सजाएंगे'सत्ता के गलियारे में सरगर्मी बढ़ चुकी थी। देश के सबसे बड़े सूबे में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका था...
24/02/2022

'मथुरा भी सजाएंगे'

सत्ता के गलियारे में सरगर्मी बढ़ चुकी थी। देश के सबसे बड़े सूबे में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका था। यूपी के दो लड़कों राहुल और अखिलेश ने गठबन्धन कर लिया था। सत्ता से दूर हाथी भी हुंकार भरने लगा। सबके पास चेहरे थे लेकिन भाजपा फिर से मोदी के चेहरे पर निर्भर थी। लोग कहने लगे कि भाजपा जीत भी गई तो मोदी तो सीएम बनेंगे नहीं। कोई बीजेपी को पूर्ण बहुमत भी नहीं दे रहा था।

फिर चुनाव जीतने के जादूगर अमित शाह ने एक चाल चल दी,
टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज थी, "दिल्ली से गोरखपुर लंबी बात हुई"

पहला चरण खतम हो रहा था और हलचल मचनी शुरू हुई। क्या सच में ? नहीं नहीं.. इतना एक्सट्रीम चेहरा! मोदी रिस्क नहीं लेगा।

फिर अचानक सुमित अवस्थी से सुधीर चौधरी सबको एक संन्यासी का इंटरव्यू चाहिए था। मंदिर परिसर में रोज किसी न किसी चैनल की ब्रॉडकास्ट वैन खड़ी हो जा रही थी।

जनता ने भांप लिया कि केंद्रीय नेतृत्व और नागपुर की पहली चॉइस कौन है।
जनता ने तुरन्त सपना भी देख लिया कि यदि एक सन्यासी को सत्ता मिलती है तो क्या-क्या हो सकता है।

दूसरे चरण से स्टार प्रचारक की लिस्ट में पहले नंबर पर एक संत बैठ गया। हर प्रत्याशी उनकी रैली मांगने लगा। और भगवाधारी का हेलीकॉप्टर इस विधानसभा से उस विधानसभा उड़ने लगा।

चुनाव खतम हुआ और फिर आया 11 मार्च 2017.

दोपहर के 12 बजते-बजते विरोधियों के 12 बज चुके थे। लखनऊ विधानभवन पर कमल खिल चुका था।

लेकिन अंदर फिर उथल पुथल मच गई कि मुख्यमंत्री कौन?
गाजीपुर से प्रयाग तक, कई लोग दावेदारी करने लगे।

उधर संन्यासी अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए आदरणीय सुषमा स्वराज जी के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल के साथ विदेश यात्रा की तैयारी में था।

फिर नागपुर और दिल्ली में बातचीत हुई और फोन घुमाया गया, "महाराज दिल्ली आ जाओ"।

महाराज दिल्ली गए।

नागपुर का प्रश्न था, कि जिम्मेदारी संभाल लेंगे?
दो टूक जवाब था, "रामकाज करने का अवसर मिला तो जरूर करूंगा। शासन-प्रशासन तो चलेगा ही, लेकिन रामकाज में कोई राजनीतिक बाधा नहीं आनी चाहिए।"

और डील डन

19 मार्च 2017 को स्मृति उपवन, लखनऊ से हम सुन रहे थे, मंच पर खड़ा एक भगवाधारी बोल रहा था,

"मै आदित्यनाथ योगी, ईश्वर की शपथ लेता हूं............"

उसके बाद हमने वो दिन भी देखा, जिसकी प्रतीक्षा हम 500 वर्षों से कर रहे थे। इन 05 वर्षों में श्री राम जन्मभूमि केस की सुनवाई भी पूर्ण हुई, मा. न्यायालय को सभी साक्ष्य भी उपलब्ध हुए और ये विश्वास भी यदि फैसला आता है तो कानून व्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। एक मच्छर भी नहीं मरेगा।

हालांकि टांग खींचने और गिराने की बहुत कोशिश हुई, लेकिन महाराज हिले नहीं। न जाने कितने अन्तर्द्वन्द और अंतरघात सहकर भी वो डटे रहें, क्योंकि उनका उद्देश्य स्पष्ट था।

हमने रामलला के भव्य मंदिर का भूमिपूजन भी देखा और अब निर्माण कार्य भी देख रहे हैं।

मैं मानता हूं कि आज भी यूपी की शासन-प्रशासन व्यवस्था में बहुत सी खामियां हैं। उन कमियों का विरोध और उस पर सरकार से सवाल होते रहेंगे। लेकिन रामकाज के प्रति समर्पण का सम्मान तो होगा ही। वरना सेक्युलरिजम का चूरन चाटकर पागल हो चुके देश में आज किसी राजनेता की हिम्मत नहीं कि वो खुले मंच से राम और कृष्ण का नाम ले।
और योगी आदित्यनाथ का हर काम आज भी राम के नाम से ही शुरू होता है, सांप्रदायिक कहने वाले कहते रहें।

राजनीतिक विरोधी इनके शासन और इनकी कार्यशैली पर लाख सवाल उठाए लेकिन राम के प्रति योगी जी के समर्पण पर तो दुश्मन भी प्रश्न चिन्ह नहीं खड़ा कर सकता।

पक्ष हो या विपक्ष, सब जानते हैं कि आज अगर,
दिल्ली की गद्दी पर मोदी न होते,
लखनऊ के सिंहासन पर योगी न होते,
तो श्री राम जन्मभूमि की फाइल अब भी न्यायालय की ठोकरें खा रही होती।

याद रखना, वो जिस संकल्प के साथ आए थे वो उन्होंने पूरा किया है।
आज उन्होंने एक और संकल्प दोहराया है, - "मथुरा भी सजाएंगे"

इस संकल्प का मान रखना यूपी वालों!
तुम मुख्यमंत्री नहीं, देश का उज्ज्वल भविष्य चुन रहे हो। अगर आज तुमने उनका साथ नहीं दिया तो फिर कोई "योगी" तुम्हारे लिए खड़ा नहीं होगा।

जय श्रीकृष्ण!

08/02/2022

सपाई ब्राह्मणों के लिए विशेष:
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यह लोमहर्षक और मानवता को लज्जित करने वाली घटना 19 मार्च 2013 की है जब प्रदेश में स.पा. सरकार थी और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे। इटावा जिले का संतोषपुर गांव और गांव के सबसे प्रतिष्ठित और सम्मानित व्यक्ति शिव कुमार बाजपेई।
शिव कुमार बाजपेई की पत्नी उर्मिला बाजपेई अपने घर में बैठी हैं। एकाएक 20 -25 आदमी घर में प्रवेश करते हैं और उर्मिला बाजपेई को लातों से मारना शुरू कर देते हैं। वह गिर जाती हैं , उनका बाल और पैर पकड़कर खींचते हुए बाहर लाते हैं। उनके मुख पर कालिख पोतते हैं, उनके गले में जूतों और चप्पलों की माला पहनाते हैं और उन्हें गांव में घुमाते हैं और जब वे दर्द और अपमान से रोते हुए अपना मुंह हथेलियों से छुपाना चाहती हैं तो उनका हाथ पीछे बांध देते हैं।
(यह घटना अविश्वसनीय लगती होगी लेकिन इसमें एक-एक शब्द अखबारों का है। तारीख 20 मार्च 2013)
उर्मिला बाजपेई का दोष क्या था? कोई दोष नहीं। घटना कुछ इस तरह थी कि उनके पति शिव कुमार बाजपेई के पड़ोसी प्रदीप त्रिपाठी के बेटे के साथ राज बहादुर यादव की बेटी फरार हो गई।
प्रदेश में यादव शासन था और यादवों की लड़की भागी थी तो पुलिस को तो सक्रिय होना ही था। बेटा न मिला तो बाप ही सही। पुलिस ने प्रदीप त्रिपाठी को पकड़ मंगाया और कुछ दिन तो थाने में उन्हें बैठाकर, प्रताड़ित करके लड़के का पता पूछती रही और जब वह नहीं बता पाए तो उन्हें जेल भेज दिया। उर्मिला बाजपेई के पति शिवकुमार का दोष बस इतना था कि वह प्रदीप त्रिपाठी की जमानत के लिए भागदौड़ कर रहे थे।
शिव कुमार बाजपेई के सिर्फ इस गुनाह के कारण ही उनकी पत्नी उर्मिला बाजपेई के मुंह पर कालिख पोत कर, चप्पलों की माला पहनाकर और हाथ पीछे बांधकर पूरे गांव में घुमाया गया और उसके बाद यादवों का झुंड पूरे गांव में घूमा। जो भी सामने मिलता, उसे पीट-पीटकर गिरा देते और बेहद फूहड़ गालियां बकते हुए तथा औरतों को घर से निकाल कर पूरे गांव में नंगी घुमाने की धमकी देते हुए। गांव के प्राय: सभी ब्राह्मण परिवार घर के अंदर बंद , भय से कांप रहे थे और बाहर यादवों का चीख- चीख कर गालियां देने का क्रम चालू था । गांव के कुछ युवक हिम्मत करके पुलिस स्टेशन पहुंचे लेकिन वहां कोई सुनवाई नहीं हुई। यह सूचना कुछ ही देर में पूरे जिले में फैल गई और करीब 7 घंटे बाद आई. जी.के आदेश पर गांव में पी.ए.सी तैनात हुई और यादवी अत्याचार रुका।
लेकिन अभी सपा छाप पुलिस का परिचय बाकी है। इतने शर्मनाक कांड के बाद और ग्राम प्रधान सुशील यादव सहित कई पर नाम सहित की गई रिपोर्ट पर भी पुलिस ने एक भी गिरफ्तारी नहीं की। लेकिन पीड़ित परिवारों को सांत्वना देने गए लोगों में जिसमें ब्राह्मण सभा और परशुराम सेना के पदाधिकारी भी शामिल थे, उनमें से एक दर्जन से अधिक लोगों को जेल भेज दिया गया कि इनसे शांति भंग का अंदेशा है।
और शासन स्तर पर क्या हुआ? पीड़ितों का एक दल जीप में लदकर इटावा से लखनऊ पहुंचा और ब्राम्हण प्रतिनिधि तथा मुख्यमंत्री का विश्वासपात्र समझकर राज्य सरकार के मंत्री अभिषेक मिश्र से मिला। उस दिन (20 मार्च 2013) प्रायः सभी अखबारों में यह घटना बहुत विस्तार से छपी थी । अतःश्री अभिषेक मिश्र जी भी इससे पूरी तरह अवगत थे लेकिन उन्होंने यह कह कर प्रतिनिधिमंडल को लौटा दिया कि यह मुख्यमंत्री के जिले का मामला है, मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता। सुना है अभिषेक मिश्र लखनऊ के सरोजनी नगर से सपा उम्मीदवार हैं और अखिलेश यादव को विश्वास दिलाया है कि क्षेत्र के सारे ब्राम्हण वोट उन्हें ही मिलेंगे।
यह एक बानगी है उस जंगलराज की जब एक यादव सिपाही अपने अधिकारी दरोगा को बिल्ला उतरवा लेने की धमकी देता था। बहुतों को याद होगा हजरतगंज (लखनऊ )के सी.ओ अतर सिंह यादव की जिसने अपने एस.एस.पी. को कभी सैल्यूट नहीं किया बल्कि हमेशा उनसे हाथ मिलाया। एस.एस .पी .की भी बर्दाश्त करने की मजबूरी थी क्योंकि अतर सिंह के नाम के साथ 'यादव' जुड़ा था।
वैसे तो तत्कालीन जंगलराज पर कई खंडों में पुस्तक लिखी जा सकती है लेकिन उदाहरण के लिए एक घटना और --
यह वाकया झांसी का है और अखिलेश यादव के ही कार्यकाल का है। 20 जनवरी 2014 को क्षेत्र के जाने-माने भाजपा नेता बृजेश तिवारी अपनी पत्नी ,बेटे और भतीजे के साथ जा रहे थे। एक स्थानीय स.पा. नेता तेजपाल यादव के नेतृत्व में करीब एक दर्जन सपाइयों ने उन्हें घेर लिया और बृजेश तिवारी सहित उनके पूरे परिवार को भून डाला। पूरे शहर में जैसे मातम छा गया।
हत्या की रिपोर्ट लिखी गई। तत्कालीन पुलिस एस.पी. अपर्णा गांगुली के नेतृत्व में पुलिस ने तेज कार्यवाही की और पुलिस ने शीघ्र ही हत्या में प्रयुक्त हथियार सहित मुख्य अभियुक्त तेजपाल यादव को गिरफ्तार कर लिया।
एस.पी. अपर्णा गांगुली ने प्रेस
को बताया कि साक्ष्य तो यही मिल रहे हैं कि हत्या राजनीतिक कारणों से की गई है। 11 हमलावरों में से 8 को पहचान लिया गया है और एक- तेजपाल को गिरफ्तार कर लिया गया है।
लेकिन अभी तो सरकार का जातिवादी रूप आना शेष था। पुलिस डी.जी.पी. को ऊपर से निर्देश दिया गया और लखनऊ में डी.जी.पी. रिजवान ने बयान दिया कि " बृजेश तिवारी और उनके परिवार की हत्या में समाजवादी पार्टी के किसी भी नेता या कार्यकर्ता का हाथ नहीं था।"
इस बयान पर हालांकि तमाम अखबार और राजनैतिक दल डी.जी.पी. रिजवान पर टूट पड़े। तमाम अखबारों ने लिखा कि झांसी की पुलिस अधीक्षक ने जब जांच कर सपा नेता और मुख्य अपराधी तेजपाल को हथियार सहित गिरफ्तार कर लिया है और 11 में से 8 सपा कार्यकर्ताओं की पहचान भी कर ली है तो लखनऊ में बैठकर डीजीपी कैसे कह सकते हैं कि वारदात में समाजवादी पार्टी के लोग शामिल नहीं हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने तो यहां तक लिखा था कि श्री रिजवान एक पुलिस अधिकारी की तरह नहीं बल्कि राजनीतिक निष्ठा के अनुसार कार्य कर रहे हैं।
लेकिन डी.जी.पी. का बयान ही उनका एक तरह से आदेश था और बृजेश तिवारी और उनके पूरे परिवार की हत्या के आरोपी छोड़ दिए गए। और समाजवादी पार्टी को इसका नतीजा भी मिला।
याद होगा कि कुछ महीने पहले स.पा. ज़िलों- जिलों में ब्राह्मण सम्मेलन करवा रही थी। ऐसा ही एक सम्मेलन झांसी में भी आयोजित किया गया लेकिन बृजेश तिवारी हत्याकांड और उसमें हुए जातीय पक्षपात से आहत झांसी के ब्राह्मणों ने स.पा. के उस आयोजन के बहिष्कार का निर्णय लिया और उस आयोजन में जिले का एक भी ब्राह्मण नहीं पहुंचा इसलिए उन्हें यह आयोजन रद्द करना पड़ा।
कहीं भी, कोई भी मुख्यमंत्री होगा, उसकी कोई जाति भी होगी । क्या उस जाति के लोगों द्वारा इटावा के संतोषपुर जैसी घटना का कोई दूसरा उदाहरण देश में मिलेगा? जहां एक निर्दोष, सम्भ्रांत महिला को बिना किसी दोष के, मुंह काला करके, जूतों की माला पहना कर गांव में घुमाया गया हो और पुलिस ने कोई कार्यवाही न की हो -यह अखिलेश यादव के राज में ही संभव है ।
( इस आलेख का संपूर्ण विवरण अखबारों से लिया गया है।
वे अखबार हैं-- अमर उजाला -20 मार्च 2013 ; जागरण -21 मार्च 2013; जागरण - 31 मार्च 2013 ; टाइम्स आफ इंडिया - 21 जनवरी 2014; नवभारत टाइम्स -25 जनवरी 2014।)

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