24/02/2022
'मथुरा भी सजाएंगे'
सत्ता के गलियारे में सरगर्मी बढ़ चुकी थी। देश के सबसे बड़े सूबे में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका था। यूपी के दो लड़कों राहुल और अखिलेश ने गठबन्धन कर लिया था। सत्ता से दूर हाथी भी हुंकार भरने लगा। सबके पास चेहरे थे लेकिन भाजपा फिर से मोदी के चेहरे पर निर्भर थी। लोग कहने लगे कि भाजपा जीत भी गई तो मोदी तो सीएम बनेंगे नहीं। कोई बीजेपी को पूर्ण बहुमत भी नहीं दे रहा था।
फिर चुनाव जीतने के जादूगर अमित शाह ने एक चाल चल दी,
टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज थी, "दिल्ली से गोरखपुर लंबी बात हुई"
पहला चरण खतम हो रहा था और हलचल मचनी शुरू हुई। क्या सच में ? नहीं नहीं.. इतना एक्सट्रीम चेहरा! मोदी रिस्क नहीं लेगा।
फिर अचानक सुमित अवस्थी से सुधीर चौधरी सबको एक संन्यासी का इंटरव्यू चाहिए था। मंदिर परिसर में रोज किसी न किसी चैनल की ब्रॉडकास्ट वैन खड़ी हो जा रही थी।
जनता ने भांप लिया कि केंद्रीय नेतृत्व और नागपुर की पहली चॉइस कौन है।
जनता ने तुरन्त सपना भी देख लिया कि यदि एक सन्यासी को सत्ता मिलती है तो क्या-क्या हो सकता है।
दूसरे चरण से स्टार प्रचारक की लिस्ट में पहले नंबर पर एक संत बैठ गया। हर प्रत्याशी उनकी रैली मांगने लगा। और भगवाधारी का हेलीकॉप्टर इस विधानसभा से उस विधानसभा उड़ने लगा।
चुनाव खतम हुआ और फिर आया 11 मार्च 2017.
दोपहर के 12 बजते-बजते विरोधियों के 12 बज चुके थे। लखनऊ विधानभवन पर कमल खिल चुका था।
लेकिन अंदर फिर उथल पुथल मच गई कि मुख्यमंत्री कौन?
गाजीपुर से प्रयाग तक, कई लोग दावेदारी करने लगे।
उधर संन्यासी अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए आदरणीय सुषमा स्वराज जी के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल के साथ विदेश यात्रा की तैयारी में था।
फिर नागपुर और दिल्ली में बातचीत हुई और फोन घुमाया गया, "महाराज दिल्ली आ जाओ"।
महाराज दिल्ली गए।
नागपुर का प्रश्न था, कि जिम्मेदारी संभाल लेंगे?
दो टूक जवाब था, "रामकाज करने का अवसर मिला तो जरूर करूंगा। शासन-प्रशासन तो चलेगा ही, लेकिन रामकाज में कोई राजनीतिक बाधा नहीं आनी चाहिए।"
और डील डन
19 मार्च 2017 को स्मृति उपवन, लखनऊ से हम सुन रहे थे, मंच पर खड़ा एक भगवाधारी बोल रहा था,
"मै आदित्यनाथ योगी, ईश्वर की शपथ लेता हूं............"
उसके बाद हमने वो दिन भी देखा, जिसकी प्रतीक्षा हम 500 वर्षों से कर रहे थे। इन 05 वर्षों में श्री राम जन्मभूमि केस की सुनवाई भी पूर्ण हुई, मा. न्यायालय को सभी साक्ष्य भी उपलब्ध हुए और ये विश्वास भी यदि फैसला आता है तो कानून व्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। एक मच्छर भी नहीं मरेगा।
हालांकि टांग खींचने और गिराने की बहुत कोशिश हुई, लेकिन महाराज हिले नहीं। न जाने कितने अन्तर्द्वन्द और अंतरघात सहकर भी वो डटे रहें, क्योंकि उनका उद्देश्य स्पष्ट था।
हमने रामलला के भव्य मंदिर का भूमिपूजन भी देखा और अब निर्माण कार्य भी देख रहे हैं।
मैं मानता हूं कि आज भी यूपी की शासन-प्रशासन व्यवस्था में बहुत सी खामियां हैं। उन कमियों का विरोध और उस पर सरकार से सवाल होते रहेंगे। लेकिन रामकाज के प्रति समर्पण का सम्मान तो होगा ही। वरना सेक्युलरिजम का चूरन चाटकर पागल हो चुके देश में आज किसी राजनेता की हिम्मत नहीं कि वो खुले मंच से राम और कृष्ण का नाम ले।
और योगी आदित्यनाथ का हर काम आज भी राम के नाम से ही शुरू होता है, सांप्रदायिक कहने वाले कहते रहें।
राजनीतिक विरोधी इनके शासन और इनकी कार्यशैली पर लाख सवाल उठाए लेकिन राम के प्रति योगी जी के समर्पण पर तो दुश्मन भी प्रश्न चिन्ह नहीं खड़ा कर सकता।
पक्ष हो या विपक्ष, सब जानते हैं कि आज अगर,
दिल्ली की गद्दी पर मोदी न होते,
लखनऊ के सिंहासन पर योगी न होते,
तो श्री राम जन्मभूमि की फाइल अब भी न्यायालय की ठोकरें खा रही होती।
याद रखना, वो जिस संकल्प के साथ आए थे वो उन्होंने पूरा किया है।
आज उन्होंने एक और संकल्प दोहराया है, - "मथुरा भी सजाएंगे"
इस संकल्प का मान रखना यूपी वालों!
तुम मुख्यमंत्री नहीं, देश का उज्ज्वल भविष्य चुन रहे हो। अगर आज तुमने उनका साथ नहीं दिया तो फिर कोई "योगी" तुम्हारे लिए खड़ा नहीं होगा।
जय श्रीकृष्ण!