23/05/2025
*प्रकृति का संरक्षक और मानवता का रक्षक नहीं रहा*
आज समूचा थार रो रहा है, थार का हरेक वन्य प्राणी जार जार रो रहा है। रो रहे हैं पेड़, मुरझाकर गिर चुके हैं पुष्प।उनका रखवाला अब नहीं आएगा ।नहीं भागेगा अब हिरणों को बचाने, नहीं जागेगा गोडावण का सजग प्रहरी। जो वन एवं वन्य प्राणियों की सलामती के लिए अपनी भूख और नींद का सौदा कर लेता था आज वो प्रकृति का प्रहरी प्रकृति की गोद में चिरनिद्रा में लीन हो गया। लिखते हुए यकीन नहीं हो रहा कि पर्यावरण का सजग प्रहरी राधेश्याम बिश्नोई इस लोक में नहीं है।अपनी छोटी सी उम्र में राधेश्याम वो पाठ पढ़ा गए जो सदियों तक याद रखा जाएगा। न सम्मान की चाह, न पुरस्कारों की दौड़, न ही मंच का मोह। अपने जीवन के एकमात्र लक्ष्य
'वन्य प्राणियों की रक्षा' को लेकर चलने वाला शख्स आज वन्य प्राणियों के लिए दौड़ते हुए जीवन की दौड़ पूरी कर गया। सारे शहर के साथ सारे जंगल को भी वीरान कर गया।
रुक गई सांसें,थम गया सफर मगर .... शेष रह गए आंसू और पीड़...न केवल लोगों के बल्कि पशु पक्षियों के भी।
आज की रात समूचा थार रो रहा है, अपने साथी के लिए।
तुम नहीं रहे, तुम सदा रहोगे। हां, मनुष्य तो क्या लाखों परिंदों के दिलों में। तुम सदा रहोगे.......
मेरा अंतिम प्रणाम स्वीकार करना प्यारे राधे।