Port Blair Ajit

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Port Blair Ajit एक सामान्य जानकारी जो किसी के लिये उपयोगी हो सकती हो।

31/08/2026
31/08/2026

कर्नाटक में 20 साल की लड़की के विरुद्ध झूठ की गूंज वेबसाईट खोलने पर fir हो गई है पता नहीं चरणचुंबन वालों में खुशी होगी या नहीं पर वह बालिका भूल गई थी कि कुछ भी बोलना तो गैर कांग्रेस शासित प्रदेशों में बोलो तो यह लोकतंत्र है परंतु कांगेस शासित राज्यों में यह लोकतंत्र की हत्या है. चाहे भले ही फेक्ट चेक हो.

21/06/2023

भारतीय संविधान के अनुसार भारत के बहुसंख्यक लोगों के लिए क्या अधिकार है जैसे अल्पसंख्यक को बहुत सकृपया तर्कपूर्ण टिप्पणी करें.

10/05/2023

सोशल मीडिया में दो वीडियो वायरल हैं। दावा किया जा रहा है कि हिंदू के साथ दिखने पर मुस्लिम युवतियों को जयपुर में इस्....

13/11/2022

नंद बाबा चुपचाप रथ पर कान्हा के वस्त्राभूषणों की गठरी रख रहे थे। दूर ओसारे में मूर्ति की तरह शीश झुका कर खड़ी यशोदा को देख कर कहा- दुखी क्यों हो यशोदा, दूसरे की बस्तु पर अपना क्या अधिकार?

यशोदा ने शीश उठा कर देखा नंद बाबा की ओर, उनकी आंखों में जल भर आया था। नंद निकट चले आये। यशोदा ने भारी स्वर से कहा- तो क्या कान्हा पर हमारा कोई अधिकार नहीं? ग्यारह वर्षों तक हम असत्य से ही लिपट कर जीते रहे?

नंद ने कहा- अधिकार क्यों नहीं, कन्हैया कहीं भी रहे, पर रहेगा तो हमारा ही लल्ला न! पर उसपर हमसे ज्यादा देवकी वसुदेव का अधिकार है, और उन्हें अभी कन्हैया की आवश्यकता भी है।

यशोदा ने फिर कहा- तो क्या मेरे ममत्व का कोई मोल नहीं?
नंद बाबा ने थके हुए स्वर में कहा- ममत्व का तो सचमुच कोई मोल नहीं होता यशोदा। पर देखो तो, कान्हा ने इन ग्यारह वर्षों में हमें क्या नहीं दिया है। उम्र के उत्तरार्ध में जब हमने संतान की आशा छोड़ दी थी, तब वह हमारे आंगन में आया। तुम्हें नहीं लगता कि इन ग्यारह वर्षों में हमने जैसा सुखी जीवन जिया है, वैसा कभी नहीं जी सके थे। दूसरे की वस्तु से और कितनी आशा करती हो यशोदा, एक न एक दिन तो वह अपनी बस्तु मांगेगा ही न! कान्हा को जाने दो यशोदा।

यशोदा से अब खड़ा नहीं हुआ जा रहा था, वे वहीं धरती पर बैठ गयी, कहा- आप मुझसे क्या त्यागने के लिए कह रहे हैं, यह आप नहीं समझ रहे।
नंद बाबा की आंखे भी भीग गयी थीं। उन्होंने हारे हुए स्वर में कहा- तुम देवकी को क्या दे रही हो यह मुझसे अधिक कौन समझ सकता है यशोदा! आने वाले असंख्य युगों में किसी के पास तुम्हारे जैसा दूसरा उदाहरण नहीं होगा। यह जगत सदैव तुम्हारे त्याग के आगे नतमस्तक रहेगा।

यशोदा आँचल से मुह ढांप कर घर मे जानें लगीं तो नंद बाबा ने कहा- अब कन्हैया तो भेज दो यशोदा, देर हो रही है।
यशोदा ने आँचल को मुह पर और तेजी से दबा लिया, और अस्पस्ट स्वर में कहा- एक बार उसे खिला तो लेने दीजिये, अब तो जा रहा है। कौन जाने फिर...
नंद चुप हो गए।

यशोदा माखन की पूरी मटकी ले कर ही बैठी थीं, और भावावेश में कन्हैया की ओर एकटक देखते हुए उसी से निकाल निकाल कर खिला रही थी। कन्हैया ने कहा- एक बात पूछूं मइया?
यशोदा ने जैसे आवेश में ही कहा- पूछो लल्ला।
- तुम तो रोज मुझे माखन खाने पर डांटती थी मइया, फिर आज अपने ही हाथों क्यों खिला रही हो?

यशोदा ने उत्तर दे

08/05/2022

[07/05, 16:26] +91 82993 44977: *शिक्षक का अदभुत ज्ञान*

*मनुष्य मांसाहारी है या शाकाहारी है....पुरा पढिये*

एक बार एक चिंतनशील शिक्षक ने अपने 10th स्टेंडर्ड के बच्चों से पूछा कि
आप लोग कहीं जा रहे हैं और
सामने से कोई कीड़ा मकोड़ा या कोई साँप छिपकली या कोई गाय-भैंस या अन्य कोई ऐसा विचित्र जीव दिख गया, जो आपने जीवन में पहले कभी नहीं देखा हो, तो प्रश्न यह है कि
आप कैसे पहचानेंगे कि
वह जीव *अंडे* देता है *या बच्चे* ?
क्या पहचान है उसकी ?

अधिकांश बच्चे मौन रहे
जबकि कुछ बच्चों में बस आंतरिक खुसर-फुसर चलती रही...।

मिनट दो मिनट बाद
फिर उस चिंतनशील शिक्षक ने स्वयं ही बताया कि
बहुत आसान है,,
जिनके भी *कान बाहर* दिखाई देते हैं *वे सब बच्चे देते हैं*
और जिन जीवों के *कान बाहर नहीं* दिखाई देते हैं
*वे अंडे* देते हैं.... ।।
फिर दूसरा प्रश्न पूछा कि–
ये बताइए आप लोगों के सामने एकदम कोई प्राणी आ गया... तो आप कैसे पहचानेंगे की यह *शाकाहारी है या मांसाहारी ?*
क्योंकि आपने तो उसे पहले भोजन करते देखा ही नहीं,
बच्चों में फिर वही कौतूहल और खुसर फ़ुसर की आवाजें.....

शिक्षक ने कहा–
देखो भाई बहुत आसान है,,
जिन जीवों की *आँखों की बाहर की यानी ऊपरी संरचना गोल होती है, वे सब के सब माँसाहारी होते हैं*,
जैसे-कुत्ता, बिल्ली, बाज, चिड़िया, शेर, भेड़िया, चील या अन्य कोई भी आपके आस-पास का जीव-जंतु जिसकी आँखे गोल हैं वह माँसाहारी ही होगा है,
ठीक उसी तरह जिसकी *आँखों की बाहरी संरचना लंबाई लिए हुए होती है, वे सब के सब जीव शाकाहारी होते हैं*,
जैसे- हिरन, गाय, हाथी, बैल, भैंस, बकरी,, इत्यादि।
इनकी आँखे बाहर की बनावट में लंबाई लिए होती है ....

फिर उस चिंतनशील शिक्षक ने बच्चों से पूछा कि-
बच्चों अब ये बताओ कि मनुष्य की आँखें गोल हैं या लंबाई वाली ?

इस बार सब बच्चों ने कहा कि मनुष्य की आंखें लंबाई वाली होती है...
इस बात पर
शिक्षक ने फिर बच्चों से पूछा कि
यह बताओ इस हिसाब से मनुष्य शाकाहारी जीव हुआ या माँसाहारी ??
सब के सब बच्चों का उत्तर था *शाकाहारी* ।

फिर शिक्षक से पूछा कि
बच्चों यह बताओ कि
फिर मनुष्य में बहुत सारे लोग मांसाहार क्यों करते हैं ?
तो इस बार बच्चों ने बहुत ही गम्भीर उत्तर दिया
और वह उत्तर था कि *अज्ञानतावश या मूर्खता के कारण।*

फिर उस चिंतनशील शिक्षक ने बच्चों को दूसरी बात यह बताई कि
जिन भी *जीवों के नाखून तीखे नुकीले होते हैं, वे सब के सब माँसाहारी* होते हैं,
जैसे- शेर, बिल्ली, कुत्ता, बाज, गिद्ध या अन्य कोई तीखे नुकीले नाखूनों वाला जीव....
और
जिन जीवों के *नाखून चौड़े चपटे होते हैं वे सब के सब शाकाहारी* होते हैं,
जैसे-मनुष्य, गाय, घोड़ा, गधा, बैल, हाथी, ऊँट, हिरण, बकरी इत्यादि।

इस हिसाब से भी अब ये बताओ बच्चों कि मनुष्य के नाखून तीखे नुकीले होते हैं या चौड़े चपटे ??

सभी बच्चों ने कहा कि
चौड़े चपटे,,

फिर शिक्षक ने पूछा कि
अब ये बताओ इस हिसाब से मनुष्य कौन से जीवों की श्रेणी में हुआ ??
सब के सब बच्चों ने एक सुर में कहा कि *शाकाहारी ।*

फिर शिक्षक ने बच्चों से तीसरी बात यह बताई कि,
जिन भी *जीवों अथवा पशु-प्राणियों को पसीना आता है, वे सब के सब शाकाहारी* होते हैं,
जैसे- घोड़ा, बैल, गाय, भैंस, खच्चर, आदि अनेकानेक प्राणी... ।
जबकि
*माँसाहारी जीवों को पसीना नहीं आता है, इसलिए कुदरती तौर पर वे जीव अपनी जीभ निकाल कर लार टपकाते हुए हाँफते रहते हैं*
इस प्रकार वे अपनी शरीर की गर्मी को नियंत्रित करते हैं.... ।

तो प्रश्न यह उठता है कि
मनुष्य को पसीना आता है या मनुष्य जीभ से अपने तापमान को एडजस्ट करता है ??

सभी बच्चों ने कहा कि मनुष्य को पसीना आता है,

शिक्षक ने कहा कि अच्छा यह बताओ कि
इस बात से भी मनुष्य कौन सा जीव सिद्ध हुआ, सब के सब बच्चों ने एक साथ कहा –
*शाकाहारी ।*
सभी लोग विशेषकर अहिंसा में, सनातन धर्म, संस्कृति और परम्पराओं में विश्वास करने वाले लोग भी चाहे तो बच्चों को नैतिक-बौधिक ज्ञान देने अथवा सीखने-पढ़ाने के लिए इस तरह बातचीत की शैली विकसित कर सकते हैं,
इससे जो वे समझेंगे सीखेंगे वह उन्हें जीवनभर काम आएगा...
याद रहेगा, पढ़ते वक्त बोर भी नहीं होंगे....।

*बच्चे अगर बड़े हो जाएं तो उनको यह भी बताएं कि कैसे शाकाहारी मनुष्य जानकारी के अभाव में मांसाहार का उपयोग करता है और कहता है कि जब अन्न नहीं उपजाया जाता था तब मनुष्य मांसाहार का सेवन करते थे, जो सरासर गलत है तब मनुष्य कंद-मुल एवं फलों पर जीवित रहते थे ।
[07/05, 22:14] +91 95580 33966: *केदारनाथ मंदिर एक अनसुलझी* संहिता है।

केदारनाथ मंदिर का
निर्माण किसने करवाया,
इसके बारे में कई बातें कही जाती हैं।

पांडवों से लेकर आदि शंकराचार्य तक, लेकिन हम इसमें नहीं जाना चाहते।

आज का विज्ञान
बताता है कि, केदारनाथ मंदिर शायद 8वीं शताब्दी में बना था।

यदि आप ना भी कहते हैं,
तो भी यह मंदिर कम से कम 1200 वर्षों से अस्तित्व में है।

21वीं सदी में भी
केदारनाथ की भूमि भवन शिल्प के लिए सही नहीं है।

एक ओर 22,000 फीट
ऊँची केदारनाथ पहाड़ी, दूसरी तरफ 21,600 फीट ऊँची कराचकुंड और तीसरी तरफ 22,700 फीट ऊँचा भरतकुंड है।
इन तीन पर्वतों से
होकर बहने वाली पाँच नदियाँ हैं मंदाकिनी, मधुगंगा, चिरगंगा, सरस्वती और स्वरंदारी।

इनमें से कुछ पुराण में लिखे गए हैं।

यह क्षेत्र
"मंदाकिनी नदी" का
एकमात्र भूखंड है। भवन शिल्प कलाकृति कितनी गहरी रही होगी।

ऐसे स्थान पर
भवन कलाकृति बनाना, जहाँ ठंड के दिनों में भारी मात्रा में बर्फ हो और बरसात के मौसम में बहुत तेज गति से पानी बहता हो।

आज भी आप
वाहन से उस स्थान तक नहीं जा सकते जहाँ आज "केदारनाथ मंदिर" है। इसे ऐसे स्थान पर क्यों बनाया गया? इसके बिना 100-200 नहीं तो 1000 साल से अधिक समय तक ऐसी विकट, प्रतिकूल परिस्थितियों में मंदिर कैसे बनाया जा सकता है?

हम सभी को
कम से कम एक बार यह सोचना चाहिए।
वैज्ञानिक अनुमान लगाते हैं कि, यदि मंदिर 10वीं शताब्दी में पृथ्वी पर होता, तो यह "हिम युग" की एक छोटी अवधि में होता।

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ जियोलॉजी, देहरादून ने केदारनाथ मंदिर की चट्टानों पर लिग्नोमैटिक डेटिंग का परीक्षण किया।
यह "पत्थरों के जीवन" की पहचान करने के लिए किया जाता है। परीक्षण से पता चला कि मंदिर 14वीं सदी से लेकर 17वीं सदी के मध्य तक पूरी तरह से बर्फ में दब गया था।
हालांकि, मंदिर के
निर्माण में कोई हानि नहीं हुई।

2013 में केदारनाथ में
आई विनाशकारी बाढ़ को सभी ने देखा होगा। इस अवधि के दौरान औसत से 375% अधिक वर्षा हुई थी। आगामी बाढ़ में "5748 लोग" (सरकारी आंकड़े) मारे गए और 4200 गाँवों को क्षति हुई।

भारतीय वायुसेना ने
1 लाख 10 हजार से ज्यादा लोगों को एयरलिफ्ट किया।
लेकिन इतने भीषण बाढ़ में भी केदारनाथ मंदिर का पूरा ढाँचा किंचित मात्र भी प्रभावित नहीं हुआ।

भारतीय पुरातत्व सोसायटी के अनुसार, बाढ़ के उपरांत भी मंदिर के पूरे ढाँचे के ऑडिट में 99 फीसदी मंदिर पूरी तरह सुरक्षित है।

2013 की बाढ़ और इसकी वर्तमान स्थिति के दौरान निर्माण को कितनी क्षति हुई थी, इसका अध्ययन करने के लिए "आईआईटी मद्रास" ने मंदिर पर "एनडीटी परीक्षण" किया।

उन्होंने यह भी कहा कि,
मंदिर पूरी तरह से सुरक्षित और सुदृढ़ है।

यदि मंदिर
दो अलग-अलग संस्थानों
द्वारा आयोजित एक बहुत ही "वैज्ञानिक और तकनीकी परीक्षण" में उत्तीर्ण नहीं होता है, तो आपको सबसे अच्छा क्या समझ आता जो यह ब्लॉग कहता है?

1200 साल बाद,
आज अगर आप तीर्थाटन पर वहाँ जाते हैं तो जहाँ उस क्षेत्र में आप की आवश्यकता का सब कुछ ले जाया जाता है, वहाँ एक भी ढाँचा खड़ा नहीं होता है।
यह मंदिर मन ही मन वहीं खड़ा है और खड़ा ही नहीं, बहुत सुदृढ़ है।

इसके पीछे
जिस विधि से इस
मंदिर का निर्माण किया गया है, उसे माना जा रहा है।

जिस स्थान का
चयन किया गया है। आज विज्ञान कहता है कि, मंदिर के निर्माण में जिस पत्थर और संरचना का उपयोग किया गया है, उसी कारण यह मंदिर इस बाढ़ में बच पाया।

यह मंदिर "उत्तर-दक्षिण" की दिशा में बनाया गया है। ध्यान दीजिए केदारनाथ को "दक्षिण-उत्तर" बनाया गया है जबकि भारत में लगभग सभी मंदिर "पूर्व-पश्चिम" हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि मंदिर "पूर्व-पश्चिम" होता तो पहले ही नष्ट हो चुका होता। या कम से कम 2013 की बाढ़ में तबाह हो जाता। लेकिन, इस दिशा की वजह से केदारनाथ मंदिर बच गया है।

दूसरी बात यह है कि, इसमें उपयोग किया गया पत्थर बहुत कठोर और टिकाऊ होता है। विशेष बात यह है कि, इस मंदिर के निर्माण के लिए उपयोग किया गया पत्थर वहाँ उपलब्ध नहीं है, तो जरा सोचिए कि, उस पत्थर को वहाँ कैसे ले जाया जा सकता था।
उस समय इतना बड़ा पत्थर ढोने के लिए इतने उपकरण भी उपलब्ध नहीं थे।

इस पत्थर की
विशेषता यह है कि, 400 साल तक बर्फ के नीचे रहने के बाद भी इसके "गुणों" में कोई अंतर नहीं है।
इसलिए, मंदिर ने प्रकृति के विध्वंस चक्र में भी अपनी शक्ति बनाए रखी है।

मंदिर के बाहर से
लाए गए इन सुदृढ़ पत्थरों को बिना किसी सीमेंट के "एशलर" तरीके से एक साथ चिपका दिया गया है।
इसलिए पत्थर के जोड़ पर तापमान परिवर्तन के किसी भी प्रभाव के बिना मंदिर की ताकत अभेद्य है।

2013 में, वीटा घलाई के माध्यम से मंदिर के पिछले हिस्से में एक बड़ी चट्टान फँस गई और पानी की धार विभाजित हो गई और मंदिर के दोनों किनारों का पानी अपने साथ सब कुछ ले गया।

लेकिन, मंदिर और मंदिर में शरण लेने वाले लोग सुरक्षित रहे। जिन्हें अगले दिन भारतीय वायुसेना ने एयरलिफ्ट किया था।

सवाल यह है कि,
आस्था पर विश्वास किया
जाए या नहीं। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि, मंदिर के निर्माण के लिए स्थल, उसकी दिशा, वही निर्माण सामग्री और यहाँ तक ​​कि, प्रकृति को भी ध्यान से चुना गया था, जो 1200 वर्षों तक अपनी संस्कृति और सुदृढ़ता को बनाए रखेगा।

टाइटैनिक के
डूबने के बाद, पश्चिमी लोगों ने अनुभव किया कि, कैसे "एनडीटी परीक्षण" और "तापमान" विनाशकारी ज्वार को मोड़ सकते हैं।
किंतु, हमारे पास उन पाश्चात्य देशों के वैज्ञानिकों के विचार हैं, पर यह हमारे देश में 1200 साल पहले किया गया था।

क्या केदारनाथ वही ज्वलंत उदाहरण नहीं है?

कुछ महीने बारिश में, कुछ महीने बर्फ में, और कुछ साल बर्फ में भी, उन पर हमला हुवा और वर्षा निरंतर अभी भी समुद्र तल से 3969 फीट ऊपर उस को कवर करती है। हम वहाँ प्रयुक्त विज्ञान की भारी मात्रा के बारे में सोचकर दंग रह गए हैं, जिसका उपयोग 6 फुट ऊँचे मंच के निर्माण के लिए किया गया है।

आज समस्त बाढ़ों के बाद
हम एक बार पुनः केदारनाथ के उन वैज्ञानिकों के निर्माण के आगे नतमस्तक हैं, जिन्हें उसी भव्यता के साथ 12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे ऊँचा होने का सम्मान मिलेगा।

यह एक उदाहरण है कि, वैदिक हिंदू धर्म और संस्कृति कितनी उन्नत थी।

उस समय हमारे ऋषि-मुनियों यानि वैज्ञानिकों ने वास्तुकला, मौसम विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, आयुर्वेद में बहुत अधिक उन्नति की थी।

आपकी एक गौरवशाली विरासत। विश्व के हित के लिए इसे पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।

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23/04/2022

एक भाई को ट्रेन में बिना टिकट चढ़ने की आदत थी। कभी पकड़े नही गये इसलिये मन भी बढ़ता गया। अब वो किसी की भी सीट पर जाकर जबर्दस्ती बैठ भी जाते थे। टोकने पर हाथापाई पर उतर जाते थे।

ऐसे ही दिन दिन भाई का मन बढते गया। एक दिन एयर कंडीशन बोगी में चढ़ गये बिना टिकट।
और जाकर एक सज्जन की सीट पर बैठ गये। सज्जन ने मना किया तो आदतन शुरु हो गये, पहले भला बुरा कहा, फिर धमकी देने लगे, उससे भी काम नही चला तो हाथापाई पर उतारु हो गये। उस सज्जन ने फोन कर पुलिस को बुला दिया।

पुलिस के सामने भी हेकड़ी बघार रहे थे तबतक टीटी भी आ गये। उन्होने आते के साथ सबसे पहले उनसे टिकट मांगा।
अब टिकट तो उनके पास था नही तो आँय बांय बकने लगे। टीटी ने फ़ाइन की बात की, पुलिस ने अरेस्ट करने की बात की तो कहने लगे, जब मै स्टेशन में घुसा तब आपलोग कहाँ थे?
जब मै ट्रेन में चढ़ा तब क्यों नही रोका?
जब यहाँ आकर बैठा तब तो आपलोगों ने मना नही किया।
अब ये आदमी हमसे झगड़ा करने लगा तो आपलोग टिकट के बहाने इसकी तरफदारी में लग गये?
अब मेरे पास पैसा नही है और जाना इसी ट्रेन में है तो क्या आप हमको ट्रेन में से फेंक दिजियेगा?
कहाँ का न्याय है ये।
हम वर्षों से बिना टिकट चल रहे थे तब आपको क्यों नही दिखा?
अब आप खाली इस आदमी का पक्ष लेने के लिये फ़ाइन लगाने लगे?
अब उसकी हिम्मत देख, दो चार बिना टिकट यात्री और आ गये उसके पक्ष में और पुरा हंगामा शुरु कर दिये। ये क्या तरीका है?
आपलोग तानाशाही कर रहे हैं!ये आदमी झगड़ा नही करता तो आप आते क्या? आप खाली इस आदमी के सपोर्ट में ये सब कर रहे हैं। घोर अन्याय है ये। गरीबों को तो कोई देखने वाला नही है! रेल गरीबों की दुश्मन है!
टीटी और पुलिस की समझ में नही आ रहा था कि बिना टिकट यात्री को फ़ाइन और अरेस्ट करने की बात करके उन्होने गलत किया या सही???

इस लेख का किसी भी व्यक्ति या घटना आदि से कोई संबंध नहीं है,भले ही आप किसी से भी जोड़ दें।

✍️ Anmol Singh

Address

CANTT
Kanpur
208004

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