Aadishakti Mandir Darshan

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07/10/2026

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रामेश्वरम मंदिर (रामानाथस्वामी मंदिर) - एक पवित्र तीर्थ स्थलरामेश्वरम का रामानाथस्वामी मंदिर भारत के तमिलनाडु राज्य के प...
15/09/2026

रामेश्वरम मंदिर (रामानाथस्वामी मंदिर) - एक पवित्र तीर्थ स्थल

रामेश्वरम का रामानाथस्वामी मंदिर भारत के तमिलनाडु राज्य के पंबन द्वीप पर स्थित एक अत्यंत प्राचीन और प्रसिद्ध हिंदू मंदिर है। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर भारत के १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसके साथ ही, यह हिंदुओं के पवित्र 'चार धाम' (बद्रीनाथ, द्वारका, पुरी और रामेश्वरम) तीर्थयात्रा का भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है।

पौराणिक महत्व (इतिहास):
हिंदू महाकाव्य रामायण के अनुसार, यह वही स्थान है जहाँ भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई करने से पहले भगवान शिव की आराधना की थी। रावण (जो एक ब्राह्मण और शिव भक्त था) का वध करने के बाद, भगवान राम पर 'ब्रह्महत्या' का पाप लग गया था। इस पाप से मुक्त होने के लिए उन्होंने यहाँ शिवलिंग की स्थापना कर पूजा करने का निश्चय किया।

कथा के अनुसार, जब भगवान हनुमान को कैलाश पर्वत से शिवलिंग लाने भेजा गया और उन्हें आने में देर हो गई, तब माता सीता ने समुद्र तट की रेत से ही एक शिवलिंग का निर्माण कर दिया। इसे 'रामलिंगम' कहा जाता है जो मंदिर का मुख्य देवता है। बाद में हनुमान जी द्वारा लाए गए शिवलिंग को भी वहीं स्थापित किया गया, जिसे 'विश्वलिंगम' कहा जाता है। भगवान राम के निर्देशानुसार, आज भी विश्वलिंगम की पूजा रामलिंगम से पहले की जाती है।

अद्भुत वास्तुकला (Architecture):
रामानाथस्वामी मंदिर अपनी शानदार द्रविड़ वास्तुकला के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।

विश्व के सबसे लंबे गलियारे: इस मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण इसके विशाल और लंबे गलियारे (Corridors) हैं, जिन्हें दुनिया में सबसे लंबा माना जाता है। इन गलियारों में हजारों की संख्या में बलुआ पत्थर से बने नक्काशीदार खंभे हैं, जिनकी समरूपता (Symmetry) देखने लायक है।

22 पवित्र तीर्थ (जल कुंड): मंदिर परिसर के अंदर 22 पवित्र कुएं या कुंड हैं, जिन्हें 'तीर्थम' कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इन 22 कुंडों का जल अलग-अलग स्वाद का होता है और इनमें औषधीय गुण होते हैं। मुख्य मंदिर में दर्शन करने से पहले तीर्थयात्री इन 22 कुंडों में पवित्र स्नान करते हैं। यह माना जाता है कि ऐसा करने से जीवन के सभी पाप धुल जाते हैं।

निष्कर्ष:
रामेश्वरम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह भारतीय वास्तुकला, आस्था और इतिहास का एक अद्भुत संगम है। यहाँ आकर शिव और राम (विष्णु के अवतार) दोनों की उपासना एक साथ होती है, जो सनातन धर्म में शैव और वैष्णव परंपराओं के मिलन का एक खूबसूरत प्रतीक है।

मीनाक्षी अम्मन मंदिर की पौराणिक एवं ऐतिहासिक कहानीदक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य के मदुरै शहर में स्थित मीनाक्षी सुंदरेश्...
10/09/2026

मीनाक्षी अम्मन मंदिर की पौराणिक एवं ऐतिहासिक कहानी
दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य के मदुरै शहर में स्थित मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर भारत के सबसे प्राचीन और भव्य मंदिरों में से एक है। यह मंदिर देवी पार्वती (मीनाक्षी) और भगवान शिव (सुंदरेश्वर) को समर्पित है।

पौराणिक कथा:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, मदुरै के राजा मलयध्वज और रानी कंचनमाला की कोई संतान नहीं थी। उन्होंने एक महान पुत्रकामेष्टि यज्ञ किया। यज्ञ की अग्नि से तीन साल की एक बालिका प्रकट हुई। इस बालिका की एक विचित्र बात थी—उसके तीन स्तन थे।

जब राजा-रानी चिंतित हुए, तो आकाशवाणी हुई कि जब यह कन्या अपने जीवनसाथी (पति) से मिलेगी, तो इसका तीसरा स्तन अपने आप गायब हो जाएगा। राजा ने उसका नाम ताडागाकई (बाद में मीनाक्षी) रखा और उसे सभी कलाओं व युद्ध कौशल में निपुण बनाया।

बड़ी होकर मीनाक्षी ने विजय अभियान शुरू किया और सभी दिशाओं को जीतते हुए अंत में कैलाश पर्वत पहुँचीं। जैसे ही उन्होंने भगवान शिव को देखा, आकाशवाणी के अनुसार उनका तीसरा स्तन गायब हो गया। देवी मीनाक्षी समझ गईं कि भगवान शिव ही उनके स्वामी हैं। भगवान शिव 'सुंदरेश्वर' रूप धारण करके मदुरै आए और दोनों का भव्य विवाह हुआ।

वास्तुकला की ख़ासियत:
गोपुरम (Gopurams): मंदिर में 14 विशाल द्वार (गोपुरम) हैं, जिनमें सबसे बड़ा दक्षिणी गोपुरम लगभग 170 फीट ऊँचा है। इन पर हजारों देवी-देवताओं, राक्षसों और पौराणिक आकृतियों की रंग-बिरंगी सुंदर मूर्तियां तराशी गई हैं।

हजार स्तंभों वाला मण्डप (Ayiram Kaal Mandapam): मंदिर परिसर के भीतर एक प्रसिद्ध मण्डप है, जिसमें 985 कलात्मक रूप से तराशे गए पत्थर के खंभे हैं।

संगीत स्तंभ (Musical Pillars): मंदिर में ऐसे खंभे भी हैं, जिन्हें थपथपाने पर संगीत के सात सुर उत्पन्न होते हैं।

बादलों के पार बसा रहस्यमयी पर्वत मंदिर 🏔️✨हिमालय की बर्फीली चोटियों के बीच, समुद्र तल से हज़ारों फीट की ऊँचाई पर स्थित ह...
28/08/2026

बादलों के पार बसा रहस्यमयी पर्वत मंदिर 🏔️✨

हिमालय की बर्फीली चोटियों के बीच, समुद्र तल से हज़ारों फीट की ऊँचाई पर स्थित है 'श्री आदिशक्ति देवगिरी धाम'। यह एक ऐसा मंदिर है जहाँ इंसान का पहुँचना लगभग असंभव माना जाता था।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, मध्यकाल में एक परम तपस्वी साधु ने इस बीहड़ पहाड़ी पर 12 वर्षों तक अन्न-जल त्यागकर कठोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माँ आदिशक्ति ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान दिया कि यह शिखर हमेशा क्षेत्र की रक्षा करेगा।

कहा जाता है कि देवशक्तियों द्वारा केवल एक ही रात में इस भव्य पाषाण मंदिर का निर्माण हुआ था। आज भी जब सुबह सूर्य की पहली किरण इस मंदिर के स्वर्ण शिखर पर पड़ती है, तो नीचे फैले बादलों में एक अलौकिक लालिमा छा जाती है।

अद्भुत रहस्य: मंदिर के मुख्य द्वार पर जलने वाले अखंड दीपक हिमालय की तेज़ तूफ़ानी हवाओं में भी कभी नहीं बुझते।

🙏 कमेंट में "जय माँ आदिशक्ति" लिखकर माँ का आशीर्वाद प्राप्त करें और इस पोस्ट को शेयर करें!

🕉️ Shri Hinglaj Mata Temple (Nani Mandir), Pakistan 🇵🇰🌺 क्या आप जानते हैं कि पाकिस्तान में भी माँ शक्ति का एक अत्यंत पवि...
19/07/2026

🕉️ Shri Hinglaj Mata Temple (Nani Mandir), Pakistan 🇵🇰

🌺 क्या आप जानते हैं कि पाकिस्तान में भी माँ शक्ति का एक अत्यंत पवित्र शक्तिपीठ स्थित है?

श्री हिंगलाज माता मंदिर, जिसे नानी मंदिर भी कहा जाता है, पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के हिंगोल नेशनल पार्क में हिंगोल नदी के किनारे स्थित एक प्राचीन गुफा मंदिर है। यह हिंदू धर्म के 51 पवित्र शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।

✨ पौराणिक मान्यता
मान्यता है कि जब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के 51 भाग किए, तब माता सती का सिर इसी स्थान पर गिरा था। इसी कारण यह स्थान अत्यंत पवित्र शक्तिपीठ माना जाता है।

🙏 माँ हिंगलाज का स्वरूप
गुफा के भीतर एक प्राकृतिक शिला को माँ हिंगलाज के रूप में पूजा जाता है। यह मंदिर किसी भव्य मूर्ति के बजाय प्रकृति द्वारा निर्मित पवित्र शिला के कारण विशेष महत्व रखता है।

🤝 सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक
स्थानीय मुस्लिम समुदाय भी इस पवित्र स्थान का सम्मान करता है और इसे प्रेम से "नानी मंदिर" या "नानी की हज" के नाम से पुकारता है।

🚩 हिंगलाज यात्रा
हर वर्ष वसंत ऋतु में आयोजित होने वाली हिंगलाज यात्रा पाकिस्तान की सबसे बड़ी हिंदू तीर्थयात्राओं में से एक है, जिसमें लगभग 2.5 लाख श्रद्धालु भाग लेते हैं।

यात्रा के दौरान श्रद्धालु पहले पवित्र मड वोल्केनो (चंद्रगुप) पर पूजा-अर्चना करते हैं, फिर हिंगोल नदी में स्नान कर कठिन पर्वतीय मार्ग पार करते हुए माँ हिंगलाज के दर्शन करते हैं।

🌺 जय माँ हिंगलाज! 🙏

कैलाश पर्वत तिब्बत में स्थित 6,638 मीटर ऊँचा एक पवित्र पहाड़ है, जिसे हिंदू, बौद्ध, जैन और बॉन धर्मों के अनुयायी पूजते ह...
12/09/2025

कैलाश पर्वत तिब्बत में स्थित 6,638 मीटर ऊँचा एक पवित्र पहाड़ है, जिसे हिंदू, बौद्ध, जैन और बॉन धर्मों के अनुयायी पूजते हैं. यह भगवान शिव का निवास स्थान है, दुनिया का केंद्र माना जाता है, और यहाँ कई नदियों का उद्गम होता है. इसकी अनूठी पिरामिड जैसी आकृति है और इसे आज तक किसी इंसान द्वारा चढ़ाई नहीं की गई है. वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों ही इसके रहस्यों को समझने की कोशिश करते हैं.
भौगोलिक स्थिति और विशेषताएँ
स्थान: यह तिब्बत के न्गारी प्रान्त में, ट्रांसहिमालय की गंगदिसे शान पर्वत श्रृंखला में स्थित है.
ऊँचाई: इसकी ऊँचाई लगभग 6,638 मीटर (21,778 फीट) है.
आकृति: यह दूर से एक पिरामिड जैसा दिखता है.
नदियों का उद्गम: कैलाश पर्वत से सिंधु, सतलुज, ब्रह्मपुत्र और कर्णाली जैसी चार प्रमुख एशियाई नदियों का उद्गम होता है, जो इसे लाखों लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण जलस्रोत बनाता है.
धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म: इसे भगवान शिव और पार्वती का निवास स्थान माना जाता है, जो स्वर्ग और आत्माओं का अंतिम गंतव्य है.
बौद्ध धर्म: तिब्बती बौद्ध धर्म में इसे मेरु पर्वत, या पृथ्वी का केंद्र कहा जाता है.
जैन धर्म: जैन धर्म में इसे अष्टपद पर्वत कहते हैं, जहाँ पहले तीर्थंकर ऋषभदेव ने मोक्ष प्राप्त किया था.
बॉन धर्म: बॉन धर्म के लोग इसे नौ मंजिला स्वस्तिक पर्वत मानते हैं, जो आध्यात्मिक शक्ति का केंद्र है.
पर्वत से जुड़े रहस्य और मान्यताएँ
अप्राप्य शिखर: कैलाश पर्वत पर आज तक कोई भी सफलतापूर्वक चढ़ाई नहीं कर पाया है, और किसी भी पर्वतारोही को सफलता नहीं मिली है.
चुंबकीय ऊर्जा: ऐसा माना जाता है कि यहाँ एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र है, जो चढ़ाई को असंभव बनाता है.
आध्यात्मिक अनुभव: कुछ लोग यहां समय की गति में बदलाव महसूस करते हैं और कहा जाता है कि उनके बाल और नाखून तेजी से बढ़ने लगते हैं.
परिक्रमा: हर साल लाखों तीर्थयात्री कैलाश पर्वत की परिक्रमा करने आते हैं.

पुष्कर में ब्रह्मा मंदिर, जिसे जगतपिता ब्रह्मा मंदिर भी कहा जाता है, भारत के राजस्थान राज्य के पुष्कर शहर में स्थित एक ह...
05/09/2025

पुष्कर में ब्रह्मा मंदिर, जिसे जगतपिता ब्रह्मा मंदिर भी कहा जाता है, भारत के राजस्थान राज्य के पुष्कर शहर में स्थित एक हिंदू मंदिर है। यह भगवान ब्रह्मा को समर्पित बहुत कम मंदिरों में से एक है।

मंदिर के बारे में कुछ मुख्य बातें:

स्थान: यह मंदिर पुष्कर झील के पवित्र घाटों के पास स्थित है।

निर्माण: मूल मंदिर का निर्माण 14वीं शताब्दी में हुआ था। इसके बाद समय-समय पर इसका जीर्णोद्धार होता रहा है।

वास्तुकला: मंदिर लाल पत्थर और संगमरमर से बना है। इसकी वास्तुकला बहुत ही आकर्षक है। मंदिर के शिखर पर हंस का चिन्ह है, जिसे ब्रह्मा का वाहन माना जाता है।

महत्व: यह मंदिर हिंदू धर्म के प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है, खासकर कार्तिक पूर्णिमा के दौरान यहां एक बड़ा मेला लगता है। इस मेले में दुनिया भर से श्रद्धालु आते हैं।

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स्कंदपुराण और महाभारत के अनुसार, भगवान कार्तिकेय को भगवान शिव और देवी पार्वती का पुत्र और युद्ध का देवता माना जाता है। उ...
04/09/2025

स्कंदपुराण और महाभारत के अनुसार, भगवान कार्तिकेय को भगवान शिव और देवी पार्वती का पुत्र और युद्ध का देवता माना जाता है। उत्तर भारत में, उनके कुछ ही मंदिर हैं और कुरुक्षेत्र में स्थित कार्तिकेय मंदिर इनमें से एक है।

इतिहास और धार्मिक महत्व
पौराणिक कथा: यह मंदिर भगवान कार्तिकेय को समर्पित है, जिन्हें दक्षिण भारत में मुरुगन, सुब्रमण्यम, और स्कंद जैसे विभिन्न नामों से जाना जाता है। मंदिर को लेकर एक मान्यता है कि भगवान कार्तिकेय ने अपने माता-पिता और भाई गणेश से मतभेद के बाद इस स्थान पर निवास किया था।

युद्ध का देवता: माना जाता है कि कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में, जहां महाभारत का युद्ध हुआ था, भगवान कार्तिकेय ने पांडवों और कौरवों दोनों को युद्ध में विजय के लिए आशीर्वाद दिया था। इसलिए, यह स्थान धार्मिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है।

मंदिर की संरचना और वास्तुकला
मंदिर का स्थान: यह मंदिर हरियाणा के कुरुक्षेत्र में सरस्वती नदी के तट पर स्थित है।

स्थापत्य: मंदिर की वास्तुकला मुख्य रूप से उत्तर भारतीय शैली में है, जिसमें साधारण और सुंदर डिज़ाइन हैं। मंदिर के अंदर, भगवान कार्तिकेय की एक सुंदर प्रतिमा है, जो मयूर (मोर) पर बैठी हुई है। उनका वाहन मोर है, जो इस मंदिर में विशेष रूप से दर्शाया गया है।

शांतिपूर्ण वातावरण: यह मंदिर कुरुक्षेत्र के अन्य प्रमुख स्थलों जैसे ब्रह्मसरोवर और ज्योतिसर से कुछ दूरी पर है, जिससे यहाँ का वातावरण बहुत शांत और आध्यात्मिक है।

प्रमुख त्यौहार और उत्सव
स्कंद षष्ठी: कार्तिकेय जयंती, जिसे स्कंद षष्ठी के नाम से जाना जाता है, इस मंदिर में विशेष रूप से मनाई जाती है। यह दिन भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है और यहाँ बड़ी संख्या में लोग पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।

कार्तिक पूर्णिमा: कार्तिक मास के दौरान, खासकर पूर्णिमा के दिन, इस मंदिर में विशेष पूजा-पाठ और अनुष्ठान होते हैं।

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अग्रोहा धाम मंदिर (Agroha Dham Mandir) हरियाणा के हिसार जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल है। यह मंद...
03/09/2025

अग्रोहा धाम मंदिर (Agroha Dham Mandir) हरियाणा के हिसार जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल है। यह मंदिर मुख्य रूप से देवी महालक्ष्मी और महाराजा अग्रसेन को समर्पित है। इस मंदिर का इतिहास वैश्य समाज से गहराई से जुड़ा हुआ है।

इतिहास और महत्व
महाराजा अग्रसेन की नगरी: अग्रोहा वह प्राचीन नगरी है जहाँ महाराजा अग्रसेन ने शासन किया था। माना जाता है कि उन्होंने यहाँ अग्रवाल समाज की नींव रखी थी। अग्रोहा धाम अग्रवाल समुदाय के लिए एक पवित्र तीर्थ स्थल है।

स्थापना: अग्रोहा धाम का निर्माण 1976 में शुरू हुआ और 1984 में पूरा हुआ। यह मंदिर परिसर अग्रवाल समाज के प्रमुख लोगों के सहयोग से बनाया गया था।

मंदिर की वास्तुकला और आकर्षण
अग्रोहा धाम का परिसर बहुत विशाल और सुंदर है, जिसे तीन मुख्य भागों में बांटा गया है:

मुख्य मंदिर: परिसर के मध्य में स्थित मुख्य मंदिर देवी महालक्ष्मी को समर्पित है, जो अग्रवाल समाज की कुलदेवी मानी जाती हैं।

महाराजा अग्रसेन का मंदिर: पूर्वी हिस्से में महाराजा अग्रसेन का मंदिर है, जहाँ उनकी भव्य प्रतिमा स्थापित है।

देवी सरस्वती का मंदिर: पश्चिमी हिस्से में ज्ञान और कला की देवी माँ सरस्वती का मंदिर है।

अन्य आकर्षण: मंदिर परिसर में एक विशाल हनुमान जी की प्रतिमा भी स्थापित है। इसके अलावा, यहाँ बारह ज्योतिर्लिंगों से युक्त एक रामेश्वर धाम भी है, जहाँ एक सरोवर बनाया गया है। माना जाता है कि इस सरोवर में 41 पवित्र नदियों का जल मिलाया गया है।

यहाँ घूमने का सबसे अच्छा समय
हर साल शरद पूर्णिमा के अवसर पर अग्रोहा धाम में एक विशाल मेला लगता है, जिसमें देश भर से श्रद्धालु आते हैं। यह मंदिर अपनी शांति और भव्यता के लिए जाना जाता है, जो इसे आध्यात्मिक अनुभव के लिए एक आदर्श स्थान बनाता है।

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ज्योतिसर (Jyotisar) हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण हिंदू तीर्थ स्थल है। यह वही पवित्र स्थान माना जा...
03/09/2025

ज्योतिसर (Jyotisar) हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण हिंदू तीर्थ स्थल है। यह वही पवित्र स्थान माना जाता है जहाँ महाभारत के महायुद्ध से ठीक पहले, भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का अमर उपदेश दिया था। 'ज्योति' का अर्थ 'प्रकाश' और 'सर' का अर्थ 'सरोवर' या 'सार' होता है, इसलिए ज्योतिसर का शाब्दिक अर्थ 'ज्ञान का प्रकाश' या 'ज्ञान का सार' है।

इतिहास और धार्मिक महत्व

गीता का जन्मस्थान: महाभारत के अनुसार, जब अर्जुन ने युद्धभूमि में अपने ही परिजनों को देखा तो वह मोहग्रस्त हो गए और युद्ध करने से इनकार कर दिया। तब उनके सारथी बने भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन और कर्म के सही मार्ग का ज्ञान दिया, जो बाद में श्रीमद्भगवद्गीता के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह उपदेश इसी स्थान पर एक बरगद के वृक्ष के नीचे दिया गया था।

अमर बरगद का पेड़: ज्योतिसर में आज भी एक प्राचीन बरगद का वृक्ष मौजूद है, जिसे उसी मूल वृक्ष का वंशज माना जाता है जिसके नीचे कृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान दिया था। यह वृक्ष इस स्थान का सबसे प्रमुख प्रतीक है।

विराट स्वरूप का दर्शन: इसी स्थान पर भगवान कृष्ण ने अर्जुन को अपना विराट स्वरूप दिखाया था, जिसमें उन्होंने ब्रह्मांड के सभी रूपों को समाहित कर लिया था।

आकर्षण और स्थल

गीता उपदेश स्थल: यहाँ एक संगमरमर का रथ बनाया गया है, जिसमें सारथी बने भगवान कृष्ण और उनके शिष्य अर्जुन की मूर्तियाँ हैं। यह दृश्य गीता के उपदेश की ऐतिहासिक घटना को दर्शाता है।

विराट स्वरूप की प्रतिमा: यहाँ भगवान कृष्ण के विराट स्वरूप की एक भव्य और विशाल अष्टधातु की प्रतिमा भी स्थापित है, जो पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है।

लाइट एंड साउंड शो: शाम के समय यहाँ एक भव्य लाइट एंड साउंड शो का आयोजन होता है, जिसमें गीता के उपदेश और महाभारत के महत्वपूर्ण प्रसंगों को दर्शाया जाता है। यह शो पर्यटकों को एक अनूठा अनुभव प्रदान करता है।

ज्योतिसर सरोवर: इस स्थान पर एक पवित्र सरोवर भी है, जिसे ज्योतिसर सरोवर के नाम से जाना जाता है।

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