04/04/2023
हां जी, मैं ब्राह्मण हूं
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दुनिया की सबसे बुद्धिमान नस्ल का कण हूं,
हां जी, मैं ब्राह्मण हूं।
जिनकी त्याग-तपस्या की कहानी है
वेदों और ऋचाओं में भी निशानी है।
'वसुधैव तु कुटुंबकम्' जिनके नारे हैं,
जिनकी हड्डियों के धनुष से दैत्य हारे हैं,
जिन अस्त्रों-शस्त्रों से लोग कहर ढाए हैं
उसे हमने ही यज्ञ में शोधकर बनाए हैं।
कभी दधीच बने,कभी विश्वामित्र बने
हम ब्राह्मण ही इस समाज के इत्र बने।
बुद्धिमान थे, गुणगान थे, शक्तिवान थे
विश्वगुरु महान भारत की पहचान थे।
लोभ, मोह, अहंकार से सूखे थे,
हम हमेशा आदर-सम्मान के भूखे थे।
विप्र हर युग में त्यागी रहे हैं,
भारत माता के अनुरागी रहे हैं।
हमेशा समर्पित जीवन जिया है,
कभी किसी का शोषण नहीं किया है।
हालांकि सदैव हम सरफरोशी रहे हैं
मगर उनकी नजर में फिर भी दोषी रहे हैं।
हमने हमेशा कर्म का ही पाठ पढ़ाया
हमें ही जाति व्यवस्था का जिम्मेदार ठहराया
जब-जब राजनीति की बगिया खिली
जिनके साथ हम थे,सत्ता उन्हें ही मिली
जब भी कठिन परीक्षा के क्षण आए
देश-विदेश में हमने ही परचम लहराए।
कम बच्चे पैदा किए तो गारी हो गए
ब्राह्मण इस देश में भिखारी हो गए।
जीतकर भी हारते रहे हर क्षण,
क्योंकि बीच में आ गया आरक्षण।
कदम-कदम पर हम बेजार हो गए
योग्यता होते हुए भी लाचार हो गए।
कभी गाली देने वाला जगा गया
कभी ब्राह्मण सम्मेलन से ठगा गया।
बारी-बारी सब देते रहे गाली
अपमान पर बजाते रहे ताली।
मगर हम अपने में खोए रहे हैं,
या यूं कह लीजिए कि सोए रहे हैं।
आज का यह सबसे बड़ा गम है,
हमारी आबादी सबसे कम है।
आपस में लड़ें नहीं,नेक होइए,
बिखरे हुए ब्राह्मणों एक होइए।
लोगों के सारे भ्रम तोड़ सकता है,
चना अकेले भी भाड़ फोड़ सकता है।
पिछलग्गू नहीं, कोहराम बनना होगा,
आज सुदामा नहीं, परशुराम बनना होगा।
जीत पंडित पंचवटी आश्रम ऑनहा कानपूर देहात
mo no 99352 22336