03/06/2016
एक गाँव में एक गरीब दम्पति रहते थे , गरीबी के कारन उनका गुजर करना बहुत मुस्किल होता जा रहाथा. एक दिन उनको एक बैल घूमता हुआ मिल गया!
गरीब ने उसेपाकर बहुत ख़ुशी हुई और उसने किसानी करनी शुरू करदी, अब वो गरीब से, किसान बन गया और बैल से दिनरात काम लेता, और बैल को भी चारा वैगारा देता, दिन बीतते गए ,अब वो सब एक खुश हाल परिवार के साथ-२ एक जमीदार बन गया था.
लेकिन बैल फिरभी दिन रात काम करता और आपना चारा पानी खाता और आराम करता,
धीरे धीरे समय के साथ-२, किसान बैल को हटकता और मारने लगा और बोलता इताना चारा देता
हूँ सेवा करता हूँ, मैंने गलती की जो तुझे मैंने पाला पोषा,तुझे गुमने देता असे ही तो ठीकथा.
लेकिन बैल को कोई फरक नहीं, वो तो वही दिन रात कम करता और आराम करता,
बैल को तो उस किसान की बात समझ ही नहीं आती थी . समय बीतता गया और एक दिन बैल आपना शरीर छोर कर भगवान के चरणों में चला गया!
भाव यहाँ ये है, इन्शान कितना स्वार्थी,और बैल कितना परमार्थी है.
स्वार्थ हो, लेकिन कुछ हद तक ,
परमार्थ ये नहीं होता की दुसरो का भला करना , बल्कि दुसरों भला करने के साथ
-२ हमारे अन्दर ये भावना भी नहीं होनी की हमने किसी का भला किया है. बैल की तरह , क्या बैल को चारा जंगल में नहीं था, लेकिन वो न चाहते हुए भी परमार्थ करता रहा ,
यानि परमार्थ हमारा गुण नहीं , स्वभाव होना चाहिए,