25/02/2026
भारतीय रेलवे को देश की जीवनरेखा कहा जाता है।
लेकिन इस जीवनरेखा को चलाने वाले असली पहिये हैं—रेलवे लोको पायलट।
जो दिन-रात, गर्मी-सर्दी, त्योहार-परिवार से दूर रहकर करोड़ों यात्रियों को सुरक्षित उनकी मंज़िल तक पहुँचाते हैं।
दुर्भाग्य यह है कि जिनके कंधों पर इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी है, उन्हीं के साथ अक्सर सौतेला व्यवहार किया जाता है।
एक लोको पायलट ने बहुत दिनों बाद छुट्टी माँगी—
परिवार के साथ समय बिताने के लिए,
खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से अपडेट करने के लिए,
ताकि वह रेलवे की सेवा और भी बेहतर ढंग से कर सके।
लेकिन छुट्टी नहीं मिली।
कारण बताया गया—“स्टाफ नहीं है।”
जब लोको पायलट ने अपनी मजबूरी समझानी चाही,
तो जवाब में चार्जशीट का डर दिखा दिया गया।
चार्जशीट के भय से उसने छुट्टी माँगना ही छोड़ दिया।
मगर सच्चाई यह थी कि उसका मस्तिष्क और शरीर अब ट्रेन चलाने की स्थिति में नहीं था।
मजबूरी में, छुट्टी न मिलने के बावजूद, उसने कुछ दिनों तक खुद को ट्रेन संचालन से दूर रखा—
क्योंकि थका हुआ इंसान अगर ट्रेन चलाए,
तो उसकी कीमत सैकड़ों ज़िंदगियाँ चुका सकती हैं।
काम से छुट्टी लेना आलस नहीं है।
यह स्वास्थ्य, सुरक्षा और काम की गुणवत्ता के लिए अनिवार्य है।
अगर लोको पायलट सुरक्षित और स्वस्थ नहीं होगा,
तो देश की यह जीवनरेखा भी सुरक्षित नहीं रह सकती।
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