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हॉकी के जादूगर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद के राजपूत घराने में हुआ। ध्यानचंद को फुटबॉल में पेले और क्रिके...
22/11/2018

हॉकी के जादूगर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद के राजपूत घराने में हुआ। ध्यानचंद को फुटबॉल में पेले और क्रिकेट में ब्रैडमैन के बराबर माना जाता है।

जब वे हॉकी लेकर मैदान में उतरते थे तो गेंद इस तरह उनकी स्टिक से चिपक जाती थी जैसे वे किसी जादू की स्टिक से हॉकी खेल रहे हों।

हॉलैंड में एक मैच के दौरान हॉकी में चुंबक होने की आशंका में उनकी स्टिक तोड़कर देखी गई। जापान में एक मैच के दौरान उनकी स्टिक में गोंद लगे होने की बात भी कही गई। ध्यानचंद ने हॉकी में जो कीर्तिमान बनाए, उन तक आज भी कोई खिलाड़ी नहीं पहुंच सका है।

ध्यानचंद के बचपन में खिलाड़ीपन के कोई विशेष लक्षण दिखाई नहीं देते थे। इसलिए कहा जा सकता है कि हॉकी के खेल की प्रतिभा जन्मजात नहीं थी, बल्कि उन्होंने सतत साधना, अभ्यास, लगन, संघर्ष और संकल्प के सहारे यह प्रतिष्ठा अर्जित की थी।

ध्यानचंद प्रारंभिक शिक्षा के बाद 16 साल की उम्र में साधारण सिपाही के तौर पर भर्ती हो गए। जब 'फर्स्ट ब्राह्मण रेजीमेंट' में भर्ती हुए उस समय तक उनके मन में हॉकी के प्रति कोई विशेष दिलचस्पी या रुचि नहीं थी। ध्यानचंद को हॉकी खेलने के लिए प्रेरित करने का श्रेय रेजीमेंट के एक सूबेदार मेजर तिवारी को है।

मेजर तिवारी स्वंय भी हॉकी प्रेमी और खिलाड़ी थे। उनकी देखरेख में ध्यानचंद हॉकी खेलने लगे और देखते ही देखते वह दुनिया के एक महान खिलाड़ी बन गए। उनकी हॉकी की जादूगरी देखकर जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने उन्हें जर्मनी की तरफ से खेलने की पेशकश कर दी थी।

ध्यानचंद ने तीन ओलिम्पिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया तथा तीनों बार देश को स्वर्ण पदक दिलाया। भारत ने 1932 में 37 मैच में 338 गोल किए, जिसमें 133 गोल ध्यानचंद ने किए थे। दूसरे विश्व युद्ध से पहले ध्यानचंद ने 1928 (एम्सटर्डम), 1932 (लॉस एंजिल्स) और 1936 (बर्लिन) में लगातार तीन ओलिंपिक में भारत को हॉकी में गोल्ड मेडल दिलाए। वियना में ध्यानचंद की चार हाथ में चार हॉकी स्टिक लिए एक मूर्ति लगी है।

दूसरा विश्व युद्ध न हुआ होता तो वे छ: ओलिंपिक में शिरकत करने वाले दुनिया के संभवत: पहले खिलाड़ी होते ही और इस बात में शक की क़तई गुंजाइश नहीं इन सभी ओलिंपिक का गोल्ड मेडल भी भारत के ही नाम होता।

केवल हॉकी के खेल के कारण ही सेना में उनकी पदोन्नति होती गई। 1938 में उन्हें 'वायसराय का कमीशन' मिला और वे जमादार बन गए। उसके बाद एक के बाद एक दूसरे सूबेदार, लेफ्टीनेंट और कैप्टन बनते चले गए। बाद में उन्हें मेजर बना दिया गया।

1956 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उनके जन्मदिन को भारत का राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित किया गया है। इसी दिन खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। भारतीय ओलम्पिक संघ ने ध्यानचंद को शताब्दी का खिलाड़ी घोषित किया था।

चौथाई सदी तक विश्व हॉकी जगत के शिखर पर जादूगर की तरह छाए रहने वाले मेजर ध्यानचंद का 3 दिसंबर, 1979 को नई दिल्ली में देहांत हो गया। झांसी में उनका अंतिम संस्कार किसी घाट पर न होकर उस मैदान पर किया गया, जहां वे हॉकी खेला करते थे। भारत सरकार द्वारा ध्यानचंद को 'भारत रत्न' सम्मान देने की बात भी कही जा रही है।

नई दिल्लीः हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद सिंह को कौन नहीं जानता है। उनका जन्म 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद में हुआ था। वह भारतीय फील्ड हॉकी के भूतपूर्व खिलाडी व कप्तान थे उन्हें भारत एवं विश्व हॉकी के क्षेत्र में सबसे बेहतरीन खिलाडियों में शुमार किया जाता है। वे तीन बार ओलम्पिक के स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के सदस्य रहे हैं। इनमे से 1928 का एम्सटर्डम ओलोम्पिक, 1932 का लॉस एंजेल्स ओलम्पिक और 1936 का बर्लिन ओलम्पिक शामिल है। 3 दिसंबर 1979 को जब उन्होंने दुनिया से विदा ली तो उनके पार्थिव शरीर पर दो हॉकी स्टिक क्रॉस बनाकर रखी गई। ध्यानचंद ने मैदान पर जो ‘जादू’ दिखाए, वे इतिहास में दर्ज है।

ध्यानचंद की जिंदगी के कुछ रोचक किस्से:-

1) 16 साल की उम्र में सेना में भर्ती
ध्यानचंद के पिता सेना में थे, जिस वजह से बार-बार ट्रांसफर के कारण वह छठी क्लास तक ही पढ़ पाए। वर्ष 1922 में वह 16 की उम्र में ही सेना में भर्ती हो गए। सेना में लोगों को खेलते देख उनके मन में भी खेलने की ख्वाहिश जगी। सुबेदार बाले तिवारी ने उन्हें खेल की बारीकियां सिखाईं और फिर एक दिन वह देश के बेस्ट हॉकी खिलाड़ी बन गए।

2) पहला विदेशी दौरा
वर्ष 1926 में सेना चाहती थी कि हॉकी टीम न्यूजीलैंड जाए, जिसके लिए खिलाड़ियों की तलाश शुरू हुई। इस दाैरान ध्यानचंद अपनी प्रैक्टिस में जुटे रहे और मन को समझाया कि अगर काबिल हूं, तो मौका मिल ही जाएगा। फिर एक दिन कमांडिग ऑफिसर ने बुलाया और कहा, ‘जवान, तुम हॉकी खेलने के लिए न्यूजीलैंड जा रहे हो।’ ध्यानचंद को खुशी इतनी थी कि मुंह से एक शब्द नहीं निकला। यह पहला मौका था जब भारत की हॉकी टीम विदेश दौरे पर गई। न्यूजीलैंड में टीम ने कुल 21 मैच खेले और 18 में जीत का परचम लहराया। भारत ने कुल 192 गोल दागे, जिनमें 100 गोल सिर्फ ध्यानचंद के थे।

3) 24 घंटे रुका जहाजों का ट्रैफिक
1928 में ओलपिंक में गोल्ड लेकर भारतीय हॉकी टीम बंबई लौटी। स्वागत में बंबई के डाकयार्ड पर जहाजों की आवाजाही 24 घंटे नहीं हो पाई थी। ध्यानचंद का तबादला 1928 में नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस वजीरिस्तान (अब पाकिस्तान) में कर दिया गया, जहां हाकी खेलना मुश्किल था। इस वजह से 1932 ओलंपिक में ध्यानचंद के सेलेक्शन को लेकर भी दिक्कतें आईं।

4) अब किसी से नहीं हारेंगे
न्यूजीलैंड काे हराकर हॉकी टीम के भारत लौटने पर जब कर्नल जॉर्ज ध्यानचंद से पूछते हैं कि भारत की टीम एक मैच क्यों हार गई तो ध्यानचंद का जबाब होता है कि उन्हें लगा कि उनके पीछे बाकी 10 खिलाड़ी भी हैं। अगला सवाल, तो आगे क्या होगा. जवाब आता है कि किसी से हारेंगे नहीं। इस प्रदर्शन और जवाब के बाद ध्यानचंद लांस नायक बना दिए गए।

5) उधार लेकर ओलंपिक पहुंची हॉकी टीम
साल 1928. एम्सटर्डम में ओलंपिक होना था। भारत की पहली राष्ट्रीय टीम चुनने के लिए देश की कई टीमों के मैच करवाए गए। ध्यानचंद संयुक्त प्रांत की ओर से खेले और चुने गए, परंतु हॉकी संघ सिर्फ इतने ही रुपए जुट पाए, जिससे 11 खिलाड़ी ही एम्सटर्डम जा सकते थे। बाकी 2 खिलाड़ियों को नहीं भेजा जा सकता था। तब उनकी मदद के लिए बंगाल हॉकी संघ आगे आया।

6) पहली बार कहा 'जादूगर'
26 मई 1928 काे ध्यानचंद समेत कई खिलाड़ियों की तबीयत खराब थी। लेकिन उनके हौसलाें में किसी तरह की कमी नहीं थी। वाे टीम वर्ल्ड चैम्पियन बन चुकी थी, जाे उधार लेकर ओलंपिक खेलने आई थी। इसी ओलंपिक के बाद पहली बार ध्यानचंद के नाम के साथ ‘जादूगर’ शब्द जोड़ा गया। विदेशी अखबारों ने मैच में ‘जादू, जादूगर, जादू की छड़ी’ जैसे अल्फाज इस्तेमाल किए।

7) भाई संग ओलंपिक में जीता मैच
ध्यानचंद से प्रभावित होकर उनके भाई रूप सिंह भी हॉकी खेलने लगे और एक अच्छे खिलाड़ी बन गए। फिर वो मौका आया, जब दोनों भाई साथ में ओलंपिक खेले। 1932 का ओलंपिक लॉस एंजेल्स में होना था। टीम चुनी जानी थी। सेना की तरफ से ध्यानचंद और संयुक्त प्रांत की ओर से रूप सिंह भारतीय हॉकी टीम के लिए चुने गए। लेकिन इस बार भी रुपयों की दिक्कत हुई, ताे पंजाब नेशनल बैंक ने मदद की। हालांकि वह रकम भी जाने के लिए काफी न थी। फिर बंगाल हॉकी संघ ने मदद का हाथ बढ़ाया। इस ओलंपिक में भी ताबड़तोड़ गोल करते हुए अपनी टीम जीती। 14 अगस्त 1932 को अमरीका के साथ फाइनल मैच में टीम ने 1 के मुकाबले 24 गोल दागकर जीत हासिल की। इसके साथ ही भारत एक बार फिर विश्व विजेता बना।

8) विदेशी महिला ने कहा, मे आई किस यू?
जर्मनी ने इंडिया को मैसेज भिजवाया कि अगर आपकी टीम हमारे यहां आएगी तो खर्चा हम उठाएंगे। फिर इंडियन टीम ने वहां कई मैच खेले और आखिरी मैच में बर्लिन-11 को 4 गोलों से हराया। अब तक ताे विदेशी भी ध्यानचंद के दीवाने हो गए थे।चेकोस्लोवाकिया में ध्यानचंद के खेल से इम्प्रेस होकर एक युवती उनके पास अाकर बोली, ‘तुम किसी एजेंल की तरह लगते हो, क्या मैं तुम्हें किस कर सकती हूं?’ ये सुनते ध्यानचंद सकपका गए और बोले, ‘सॉरी मैं शादीशुदा हूं। मुझे माफ करें।’

9) सूरज की रोशनी से जली ओलंपिक मशाल
1936 के ओलंपिक जर्मनी में होने थे, जहां हिटलर का शासन था। टीम की पहली लिस्ट में ध्यानचंद का नाम ही नहीं था, जिस पर खूब बवाल हुआ। बाद में टीम की कप्तानी ध्यानचंद को मिली। हर तरफ हिटलर की जय जयकार थी। इस ओलंपिक के इंतजाम बेहद खर्चीले थे। ओलंपिक मशाल पहली बार सूरज की किरणों से जलाई गई। ये पहले ओलंपिक खेल थे, जिन्हें टीवी पर दिखाया गया।

10) घायल होकर खेले ध्यानचंद
1936 ओलंपिक में भारत का मुकाबला हिटलर के देश की टीम जर्मनी से था। बारिश हाेने पर मैच 15 अगस्त तक के लिए टाल दिया गया। 15 अगस्त को मैच शुरू हुआ, ताे जर्मनी खिलाड़ियों ने आक्रामक रुख अपनाया। ध्यानचंद के दांत में चोट लगी, जिसके चलते उन्हें कुछ वक्त के लिए मैदान छोड़ना पड़ा। इसके बाद ध्यानचंद चोटिल हालत में ही मैदान में लौटे और साथियों को समझाया कि बदले के लिए नहीं, बढ़िया खेल खेलो। बस फिर क्या ध्यानचंद ने वापसी के साथ ताबड़तोड़ गोल दागने शुरू किए।

11) मैदान छोड़ भागा हिटलर
भारत और जर्मनी के बीच हुए फाइनल मुकाबवे के शुरूआती मिनटों में ही ध्यानचंद की टीम ने जर्मनी की ऐसी धुलाई की कि मैच देख रहा हिटलर स्टेडियम छोड़कर चला गया। भारत ने जर्मनी को 1 के मुकाबले 8 गोल से शिकस्त दी।

12) ध्यानचंद ने ठुकराया हिटलर का ऑफर
16 अगस्त को ओलंपिक समापन में हिटलर से ध्यानचंद का सामना होना था। भारतीय हॉकी टीम गोल्ड मेडल पहनने वाली थी। हिटलर जब ध्यानचंद से मिला तो उनसे इतना इम्प्रेस हुआ कि उन्हें अपनी सेना में जनरल पद का ऑफर दिया। लेकिन ध्यानचंद ने सहज भाव से ये ऑफर ठुकरा दिया।

झींसी का इतिहास-----------------------उत्तर प्रदेश राज्य के झाँसी में बंगरा नामक पहाड़ी पर १६१३ इस्वी में यह दुर्ग ओरछा ...
22/11/2018

झींसी का इतिहास
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उत्तर प्रदेश राज्य के झाँसी में बंगरा नामक पहाड़ी पर १६१३ इस्वी में यह दुर्ग ओरछा के बुन्देल राजा बीरसिंह जुदेव ने बनवाया था। २५ वर्षों तक बुंदेलों ने यहाँ राज्य किया उसके बाद इस दुर्ग पर क्रमश मुगलों, मराठों और अंग्रजों का अधिकार रहा। मराठा शासक नारुशंकर ने १७२९-३० में इस दुर्ग में कई परिवर्तन किये जिससे यह परिवर्धित क्षेत्र शंकरगढ़ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम में इसे अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ।बुन्देलखण्ड मध्य भारत का एक प्राचीन क्षेत्र है।इसका प्राचीन नाम जेजाकभुक्ति है. इसका विस्तार मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश में भी है। बुंदेली इस क्षेत्र की मुख्य बोली है। भौगोलिक और सांस्‍कृतिक विविधताओं के बावजूद बुंदेलखंड में जो एकता और समरसता है, उसके कारण यह क्षेत्र अपने आप में सबसे अनूठा बन पड़ता है।बुंन्देेला, शासकों और महाराजा छत्रसाल राजा बुन्देेला का इतिहास होने के बावजूद बुंदेलखंड की अपनी अलग ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्‍कृतिक विरासत है। बुंदेली माटी में जन्‍मी अनेक विभूतियों ने न केवल अपना बल्कि इस अंचल का नाम खूब रोशन किया और इतिहास में अमर हो गए। महान चन्देल शासक बिधाधर चन्देल, आल्हा-ऊदल,महाराजा छत्रसाल,राजा भोज, ईसुरी, कवि पद्माकर, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, डॉ॰ हरिसिंह गौर दद्दा मैथिली शरण गुप्त मेजर ध्यान चन्द्र गोस्वामी तुलसी दास माधव प्रसाद तिवारी आदि अनेक महान विभूतियाँ इसी क्षेत्र से संबद्ध हैं।बुंदेलखंड में ही तारण पंथ का जन्म स्थान है।

भौगोलिक स्थिति
संक्षिप्‍त इतिहास संपादित करें
मुख्य लेख: बुंदेलखंड का इतिहास
डॉ नर्मदा प्रसाद गुप्‍त ने अपनी पुस्‍तक बुंदेलखंड की लोक संस्‍कृति का इतिहास में लिखा है कि अतीत में बुंदेलखंड शबर, कोल, किरात, पुलिंद और निषादों का प्रदेश था। आर्यों के मध्यदेश में आने पर जन-जातियों ने प्रतिरोध किया था। वैदिक काल से बुंदेलों के शासनकाल तक दो हज़ार वर्षों में इस प्रदेश पर अनेक जातियों और राजवंश ने शासन किया है और अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना से इन जातियों के मूल संस्कारों को प्रभावित किया है। विभिन्न शासकों में मौर्य, सुंग, शक, हुण, कुषाण, नाग, वाकाटक, गुप्त, कलचुरी, चन्देल, अफगान, मुगल, खंगार, बुंदेल, बघेल, गौड़, मराठा और अंग्रेज मुख्य हैं। ई० पू० ३२१ तक वैदिक काल से मौर्यकाल तक का इतिहास वस्तुत: बुंदेलखंड का पौराणिक-इतिहास माना जा सकता है। इसके समस्त आधार पौराणिक ग्रंथ है।

बुंदेलखंड शब्द मध्यकाल से पहले इस नाम से प्रयोग में नहीं आया है। इसके विविध नाम और उनके उपयोग आधुनिक युग में ही हुए हैं। बीसवीं शती के प्रारंभिक दशक में रायबहादुर महाराजसिंह ने बुंदेलखंड का इतिहास लिखा था। इसमे बुंदेलखंड के अंतर्गत आने वाली जागीरों और उनके शासकों के नामों की गणना मुख्य थी। दीवान प्रतिपाल सिंह ने तथा पन्ना दरबार के प्रसिद्ध कवि कृष्ण ने अपने स्रोतों से बुंदेलखंड के इतिहास लिखे परन्तु वे विद्वान भी सामाजिक सांस्कृतिक चेतनाओं के प्रति उदासीन रहे।

डॉ गुप्‍त के अनुसार मध्य भारत का इतिहास ग्रंथ में पं० हरिहर निवास द्विवेदी ने बुंदेलखंड की राजनैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक उपलब्धियों की चर्चा प्रकारांतर से की है। इस ग्रंथ में कुछ स्थानों पर बुंदेलखंड का इतिहास भी आया है। एक अच्‍छा प्रयास पं० गोरेलाल तिवारी ने किया और बुंदेलखंड का संक्षिप्त इतिहास लिखा जो अब तक के ग्रंथो से सबसे अलग था परंतु उन्‍होंने बुंदेलखंड का इतिहास समाजशास्रीय आधार पर लिख कर केवल राजनैतिक घटनाओं के आधार पर लिखा है।

बुदेलखंड के प्राचीन इतिहास के संबंध में सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण धारणा यह है कि यह चेदि जनपद का हिस्‍सा था। कुछ विद्वान चेदि जनपद को ही प्राचीन बुंदेलखंड मानते हैं। पौराणिक काल में बुंदेलखंड प्रसिद्ध शासकों के अधीन रहा है जिनमें चंद्रवंशी राजाओं के शृंखलाबद्ध शासनकाल का उल्‍लेख सबसे अधिक है। बौद्धकाल में शांपक नामक बौद्ध ने बागुढ़ा प्रदेश में भगवान बुद्ध के नाखून और बाल से एक स्तूप का निर्माण कराया था। मरहूत (वरदावती नगर) में इसके अवशेष विद्यमान हैं।

बौद्धकालीन इतिहास के संबंध में बुंदेलखंड में प्राप्त उस समय के अवशेषों से स्पष्ट है कि बुंदेलखंड की स्थिति में इस अवधि में कोई लक्षणीय परिवर्तन नहीं हुआ था। चेदि की चर्चा न होना और वत्स, अवंति के शासकों का महत्व दर्शाया जाना इस बात का प्रमाण है कि चेदि इनमें से किसी एक के अधीन रहा होगा। पौराणिक युग का चेदि जनपद ही इस प्रकार प्राचीन बुंदेलखंड हैबुंदेलखंड के ज्ञात इतिहास के अनुसार यहां ३०० ई० पू० मौर्य शासनकाल के साक्ष्‍य उपलब्‍ध है। इसके पश्‍चात वाकाटक और गुप्‍त शासनकाल, शासनकाल, शासनकाल,चंदेल|चंदेल शासनकाल, बुन्देला शासनकाल (जिनमें ओरछा के बुंदेला भी शामिल थे), मराठा शासनकाल और अंग्रेजों के शासनकाल का उल्‍लेख मिलता है।

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बुंदेलखंड की शान खजुराहो जिला छतरपुर में बुंदेला शासकों द्वारा निर्मित मंदिर विश्व प्रसिद्ध हैंं।ये हिंदू व जैन धर्म के लिये विशेष महत्व रखता है।कुंडलपुर जो जैन धर्म का महत्वपूर्ण स्थल है।मैहर में मां शारदा का मंदिर ५२ शक्ति पीठ में एक है।झांसी में किला जो लक्ष्मीबाई की वीरता को दर्शाता है।ओरछा प्रसिध्द हिंदू तीर्थों में एक है।चित्रकूट का मंदिर बेहद सुंदर है। सोनागिर प्रसिद्ध जैन तीर्थ है।१९३८ में यह किला केन्द्रीय संरक्षण में लिया गया। यह दुर्ग १५ एकड़ में फैला हुआ है। इसमें २२ बुर्ज और दो तरफ़ रक्षा खाई हैं। नगर की दीवार में १० द्वार थे। इसके अलावा ४ खिड़कियाँ थीं। दुर्ग के भीतर बारादरी, पंचमहल, शंकरगढ़, रानी के नियमित पूजा स्थल शिवमंदिर और गणेश मंदिर जो मराठा स्थापत्य कला के सुन्दर उदाहरण हैं।

कूदान स्थल, कड़क बिजली तोप पर्यटकों का विशेष आकर्षण हैं। फांसी घर को राजा गंगाधर के समय प्रयोग किया जाता था जिसका प्रयोग रानी ने बंद करवा दिया था।

किले के सबसे ऊँचे स्थान पर ध्वज स्थल है जहाँ आज तिरंगा लहरा रहा है। किले से शहर का भव्य नज़ारा दिखाई देता है। यह किला भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है और देखने के लिए पर्यटकों को टिकट लेना होता है। वर्ष पर्यन्त देखने जा सकते हैं।यहॉ सड़क तथा रेल मार्ग दोनो से पहुँचा जा सकता है।

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