22/11/2018
झींसी का इतिहास
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उत्तर प्रदेश राज्य के झाँसी में बंगरा नामक पहाड़ी पर १६१३ इस्वी में यह दुर्ग ओरछा के बुन्देल राजा बीरसिंह जुदेव ने बनवाया था। २५ वर्षों तक बुंदेलों ने यहाँ राज्य किया उसके बाद इस दुर्ग पर क्रमश मुगलों, मराठों और अंग्रजों का अधिकार रहा। मराठा शासक नारुशंकर ने १७२९-३० में इस दुर्ग में कई परिवर्तन किये जिससे यह परिवर्धित क्षेत्र शंकरगढ़ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम में इसे अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ।बुन्देलखण्ड मध्य भारत का एक प्राचीन क्षेत्र है।इसका प्राचीन नाम जेजाकभुक्ति है. इसका विस्तार मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश में भी है। बुंदेली इस क्षेत्र की मुख्य बोली है। भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधताओं के बावजूद बुंदेलखंड में जो एकता और समरसता है, उसके कारण यह क्षेत्र अपने आप में सबसे अनूठा बन पड़ता है।बुंन्देेला, शासकों और महाराजा छत्रसाल राजा बुन्देेला का इतिहास होने के बावजूद बुंदेलखंड की अपनी अलग ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत है। बुंदेली माटी में जन्मी अनेक विभूतियों ने न केवल अपना बल्कि इस अंचल का नाम खूब रोशन किया और इतिहास में अमर हो गए। महान चन्देल शासक बिधाधर चन्देल, आल्हा-ऊदल,महाराजा छत्रसाल,राजा भोज, ईसुरी, कवि पद्माकर, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, डॉ॰ हरिसिंह गौर दद्दा मैथिली शरण गुप्त मेजर ध्यान चन्द्र गोस्वामी तुलसी दास माधव प्रसाद तिवारी आदि अनेक महान विभूतियाँ इसी क्षेत्र से संबद्ध हैं।बुंदेलखंड में ही तारण पंथ का जन्म स्थान है।
भौगोलिक स्थिति
संक्षिप्त इतिहास संपादित करें
मुख्य लेख: बुंदेलखंड का इतिहास
डॉ नर्मदा प्रसाद गुप्त ने अपनी पुस्तक बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास में लिखा है कि अतीत में बुंदेलखंड शबर, कोल, किरात, पुलिंद और निषादों का प्रदेश था। आर्यों के मध्यदेश में आने पर जन-जातियों ने प्रतिरोध किया था। वैदिक काल से बुंदेलों के शासनकाल तक दो हज़ार वर्षों में इस प्रदेश पर अनेक जातियों और राजवंश ने शासन किया है और अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना से इन जातियों के मूल संस्कारों को प्रभावित किया है। विभिन्न शासकों में मौर्य, सुंग, शक, हुण, कुषाण, नाग, वाकाटक, गुप्त, कलचुरी, चन्देल, अफगान, मुगल, खंगार, बुंदेल, बघेल, गौड़, मराठा और अंग्रेज मुख्य हैं। ई० पू० ३२१ तक वैदिक काल से मौर्यकाल तक का इतिहास वस्तुत: बुंदेलखंड का पौराणिक-इतिहास माना जा सकता है। इसके समस्त आधार पौराणिक ग्रंथ है।
बुंदेलखंड शब्द मध्यकाल से पहले इस नाम से प्रयोग में नहीं आया है। इसके विविध नाम और उनके उपयोग आधुनिक युग में ही हुए हैं। बीसवीं शती के प्रारंभिक दशक में रायबहादुर महाराजसिंह ने बुंदेलखंड का इतिहास लिखा था। इसमे बुंदेलखंड के अंतर्गत आने वाली जागीरों और उनके शासकों के नामों की गणना मुख्य थी। दीवान प्रतिपाल सिंह ने तथा पन्ना दरबार के प्रसिद्ध कवि कृष्ण ने अपने स्रोतों से बुंदेलखंड के इतिहास लिखे परन्तु वे विद्वान भी सामाजिक सांस्कृतिक चेतनाओं के प्रति उदासीन रहे।
डॉ गुप्त के अनुसार मध्य भारत का इतिहास ग्रंथ में पं० हरिहर निवास द्विवेदी ने बुंदेलखंड की राजनैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक उपलब्धियों की चर्चा प्रकारांतर से की है। इस ग्रंथ में कुछ स्थानों पर बुंदेलखंड का इतिहास भी आया है। एक अच्छा प्रयास पं० गोरेलाल तिवारी ने किया और बुंदेलखंड का संक्षिप्त इतिहास लिखा जो अब तक के ग्रंथो से सबसे अलग था परंतु उन्होंने बुंदेलखंड का इतिहास समाजशास्रीय आधार पर लिख कर केवल राजनैतिक घटनाओं के आधार पर लिखा है।
बुदेलखंड के प्राचीन इतिहास के संबंध में सर्वाधिक महत्वपूर्ण धारणा यह है कि यह चेदि जनपद का हिस्सा था। कुछ विद्वान चेदि जनपद को ही प्राचीन बुंदेलखंड मानते हैं। पौराणिक काल में बुंदेलखंड प्रसिद्ध शासकों के अधीन रहा है जिनमें चंद्रवंशी राजाओं के शृंखलाबद्ध शासनकाल का उल्लेख सबसे अधिक है। बौद्धकाल में शांपक नामक बौद्ध ने बागुढ़ा प्रदेश में भगवान बुद्ध के नाखून और बाल से एक स्तूप का निर्माण कराया था। मरहूत (वरदावती नगर) में इसके अवशेष विद्यमान हैं।
बौद्धकालीन इतिहास के संबंध में बुंदेलखंड में प्राप्त उस समय के अवशेषों से स्पष्ट है कि बुंदेलखंड की स्थिति में इस अवधि में कोई लक्षणीय परिवर्तन नहीं हुआ था। चेदि की चर्चा न होना और वत्स, अवंति के शासकों का महत्व दर्शाया जाना इस बात का प्रमाण है कि चेदि इनमें से किसी एक के अधीन रहा होगा। पौराणिक युग का चेदि जनपद ही इस प्रकार प्राचीन बुंदेलखंड हैबुंदेलखंड के ज्ञात इतिहास के अनुसार यहां ३०० ई० पू० मौर्य शासनकाल के साक्ष्य उपलब्ध है। इसके पश्चात वाकाटक और गुप्त शासनकाल, शासनकाल, शासनकाल,चंदेल|चंदेल शासनकाल, बुन्देला शासनकाल (जिनमें ओरछा के बुंदेला भी शामिल थे), मराठा शासनकाल और अंग्रेजों के शासनकाल का उल्लेख मिलता है।
सामाजिक परिस्थितियां
वैभव
कला और संस्कृति
लोकाचार व परंपराएं
बुंदेली तीज-त्यौहार
साहित्य व रचनाकर्मी
प्रस्तावित बुंदेलखंड राज्य
दर्शनीय स्थल संपादित करें
बुंदेलखंड की शान खजुराहो जिला छतरपुर में बुंदेला शासकों द्वारा निर्मित मंदिर विश्व प्रसिद्ध हैंं।ये हिंदू व जैन धर्म के लिये विशेष महत्व रखता है।कुंडलपुर जो जैन धर्म का महत्वपूर्ण स्थल है।मैहर में मां शारदा का मंदिर ५२ शक्ति पीठ में एक है।झांसी में किला जो लक्ष्मीबाई की वीरता को दर्शाता है।ओरछा प्रसिध्द हिंदू तीर्थों में एक है।चित्रकूट का मंदिर बेहद सुंदर है। सोनागिर प्रसिद्ध जैन तीर्थ है।१९३८ में यह किला केन्द्रीय संरक्षण में लिया गया। यह दुर्ग १५ एकड़ में फैला हुआ है। इसमें २२ बुर्ज और दो तरफ़ रक्षा खाई हैं। नगर की दीवार में १० द्वार थे। इसके अलावा ४ खिड़कियाँ थीं। दुर्ग के भीतर बारादरी, पंचमहल, शंकरगढ़, रानी के नियमित पूजा स्थल शिवमंदिर और गणेश मंदिर जो मराठा स्थापत्य कला के सुन्दर उदाहरण हैं।
कूदान स्थल, कड़क बिजली तोप पर्यटकों का विशेष आकर्षण हैं। फांसी घर को राजा गंगाधर के समय प्रयोग किया जाता था जिसका प्रयोग रानी ने बंद करवा दिया था।
किले के सबसे ऊँचे स्थान पर ध्वज स्थल है जहाँ आज तिरंगा लहरा रहा है। किले से शहर का भव्य नज़ारा दिखाई देता है। यह किला भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है और देखने के लिए पर्यटकों को टिकट लेना होता है। वर्ष पर्यन्त देखने जा सकते हैं।यहॉ सड़क तथा रेल मार्ग दोनो से पहुँचा जा सकता है।