25/02/2026
हमारे बचपन का रमज़ान
रमज़ान हमारे बचपन में सिर्फ इबादत का महीना नहीं था, बल्कि एक पूरा सांस्कृतिक और रूहानी अनुभव था। इसके आते ही माहौल में गंभीरता, घरों में रौनक और दिलों में एक नरमी आ जाती थी। ऐसा लगता था जैसे पूरा मोहल्ला एक ही मकसद के लिए जी रहा हो, अल्लाह की रज़ा हासिल करना।
मेरा बचपन बिहार के शहर गया के मोहल्ला करीमगंज में गुज़रा। शाबान के आख़िरी दिनों से ही रमज़ान की तैयारी शुरू हो जाती थी। घरों में राशन जमा होता, मसाले साफ़ किए जाते और औरतें खास पकवानों की योजना बनातीं। यह तैयारी सिर्फ बाहरी नहीं, बल्कि दिलों की भी होती थी, खुद को बेहतर बनाने की तैयारी।
चांद रात का दृश्य बहुत सुंदर होता था। जैसे ही रमज़ान का चांद दिखाई देता, सब एक-दूसरे को “रमज़ान मुबारक” कहते। उस समय न व्हाट्सऐप था, न सोशल मीडिया, फिर भी खुशी में कोई कमी नहीं होती थी। बच्चे गलियों में दौड़ते और बड़े लोग मस्जिद से लौटकर चांद की खबर देते।
असर के बाद इफ्तार की तैयारी शुरू होती। दस्तरख़्वान पर घुगनी (चना), पकौड़े, समोसे, दही बड़े और तरह-तरह के फल सजते। शरबत ज़रूरी होता, कभी रूह अफ़ज़ा, कभी नींबू पानी। उस समय हर घर में फ्रिज नहीं था। गर्मी में मटका और सुराही ही ठंडक का सहारा थे। हम बच्चे बर्फ लेने जाते। लकड़ी के बक्से में बोरी से ढकी बर्फ रखी होती। पचास पैसे किलो के हिसाब से दो-तीन किलो बर्फ लाते और शरबत में डालते तो खुशी दोगुनी हो जाती।
इफ्तार से पहले दरवाज़े पर आवाज़ आती, “इफ्तारी मिलेगी बाजी?”
घर से इफ्तार का हिस्सा निकालकर दिया जाता। हमें बचपन में ही सिखा दिया गया था कि रमज़ान सिर्फ अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए भी जीने का महीना है।
मग़रिब की अज़ान के बाद पहला घूंट पीते ही दिल को सुकून मिलता। फिर ईशा और तरावीह के लिए मस्जिद जाते। मस्जिद में हर वर्ग के लोग एक ही सफ में खड़े होते। यह बराबरी और भाईचारे की खूबसूरत मिसाल थी। तरावीह के बाद अमरती या बनिया मिठाई के रूप में मिलती, जिसकी मिठास देर तक रहती।
सहरी का समय जैसे अलग ही दुनिया था। उस दौर में न मोबाइल थे, न डिजिटल अलार्म। मोहल्ले के चांद शाह नाम के बुज़ुर्ग हाथ में लालटेन और लाठी लेकर निकलते और दरवाज़े खटखटाकर आवाज़ देते,
“रोज़ेदारो! उठ जाओ, सहरी का वक़्त हो गया है!”
उनकी आवाज़ पूरे मोहल्ले को जगा देती।
कभी-कभी नौजवानों के काफिले भी निकलते। रिक्शा पर लाउडस्पीकर लगाकर रात में हम्द, नात और सूफ़ियाना कलाम गाते हुए गलियों से गुजरते। लोग उनकी आवाज़ सुनकर जागते और इंतज़ार भी करते।
एक बार हमने भी तय किया कि हम सहरी का काफिला निकालेंगे। “यूथ लाइब्रेरी” में मिलकर योजना बनाई। रात को हम सब दोस्तों ने मिलकर लाउडस्पीकर का इंतज़ाम किया और करीब दो बजे गली में निकले। एक-एक करके सबने अपनी आवाज़ में हम्द और नात पढ़ी। लोग मुस्कुराकर दरवाज़े खोलकर हमें देखते। वह रात आज भी यादों में रोशनी करती है।
रमज़ान हमारे लिए सिर्फ भूख और प्यास नहीं था, बल्कि अनुशासन और आत्मसंयम का महीना था। समय पर उठना, दिन भर सब्र करना, नमाज़ की पाबंदी करना, यह सब हमें व्यवस्थित जीवन का पाठ पढ़ाता था।
रमज़ान की महानता इसलिए भी है कि कुरआन शरीफ़ इसी महीने में उतरा। इसका पहला अशरा रहमत, दूसरा मग़फिरत और तीसरा जहन्नम से निजात का संदेश देता है। यह महीना हमें खुदपरस्ती से खुदा परस्ती की ओर ले जाता है।
आज समय बदल गया है। आधुनिक सुविधाओं ने जीवन आसान कर दिया है, लेकिन वह सादगी और सामूहिकता कम हो गई है। फिर भी जब रमज़ान आता है, तो दिल के किसी कोने में बचपन की वही गलियां बस जाती हैं, मटके का ठंडा पानी, बर्फ की लाइन, चांद शाह की आवाज़ और हमारे सहरी काफिले की गूंज।
हमारे बचपन का रमज़ान दरअसल एक स्कूल था, नैतिकता, अनुशासन, सब्र और मोहब्बत का स्कूल। उसने हमें सिखाया कि अगर जीवन अल्लाह की रज़ा के मुताबिक हो, तो वह सुकून और मकसद से भर जाता है। समय बदल गया है, मगर रमज़ान की रूह आज भी वही है।
उर्दू दैनिक अवध नामा ने इसे उर्दू में प्रकाशित किया है
T M Zeyaul Haque
#रमज़ान