Gaya : The Spiritual City of Bihar

Gaya : The Spiritual City of Bihar भगवान विष्णु, बुद्ध और फ़ानी के शहर की सैर

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27/04/2026

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बिहार की एक प्रतिष्ठित विद्वत एवं आध्यात्मिक हस्ती और खानकाह कादिरिया मुहम्मदिया, अमझर शरीफ (औरंगाबाद) के 14वें सज्जादा ...
26/04/2026

बिहार की एक प्रतिष्ठित विद्वत एवं आध्यात्मिक हस्ती और खानकाह कादिरिया मुहम्मदिया, अमझर शरीफ (औरंगाबाद) के 14वें सज्जादा नशीन हज़रत सैयद शाह शरफुद्दीन नायर क़ादरी (र.अ.) को आज हजारों ग़मगीन लोगों की मौजूदगी में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। उनके इंतक़ाल की ख़बर से पूरे इलाके में ग़म की लहर दौड़ गई और बड़ी संख्या में अकीदतमंद उनके अंतिम दीदार और रस्मों में शरीक हुए।

नमाज़-ए-जनाज़ा की इमामत हज़रत सैयद शाह आबिद क़ादरी ने फरमाई। इस मौके पर विभिन्न खानकाहों के सज्जादा नशीन, उलेमा-ए-कराम, सूफी बुजुर्ग और आम लोग बड़ी तादाद में मौजूद रहे।

इस अवसर पर कई प्रमुख शख्सियतें भी मौजूद थीं, जिनमें खानकाह चिश्तिया मुनामिया, गया के सज्जादा नशीन हज़रत सैयद शाह सबाउद्दीन मुनामी, हज़रत सैयद शाह अता फैसल, खानकाह चिश्तिया शेखपुरा, नवादा के सैयद शाह सलमान चिश्ती, खानकाह एमादिया, पटना के सैयद मोज़ीबुल हक़ एमादी, सिमली शरीफ, पटना के सैयद शाह अब्दुल फ़ैयाज़ उर्फ़ फ़ैयाज़ी, खानकाह बुरहानिया कमालिया, ओसास देओरा, गया के हज़रत मारूफ उस्मानिया, खानकाह असदकिया, नालंदा के हज़रत नूरुद्दीन असदक, खानकाह सुलेमानिया, दाउदनगर (औरंगाबाद) के सैयद अबुल मोहसिन क़ादरी, हज़रत मुफ्ती असगर इमाम क़ादरी (औरंगाबाद), सैयद सनाउल्लाह रिज़वी, अजमत अय्यूब क़ादरी सहित अन्य सम्मानित धार्मिक हस्तियां शामिल थीं।

इसके अलावा कई स्थानीय राजनीतिक और सामाजिक हस्तियां भी मौजूद रहीं, जिनमें पूर्व प्रमुख आरिफ रिज़वी, जिला परिषद सदस्य अख़लाक़ ख़ान, हसपुरा प्रखंड के सभी मुखिया प्रतिनिधि, विभिन्न क्षेत्रों से आए लोग, सरकारी अधिकारी और अन्य गणमान्य व्यक्ति शामिल थे।

मरहूम हज़रत सैयद शाह शरफुद्दीन नायर क़ादरी (र.अ.) एक महान आध्यात्मिक मार्गदर्शक और आलिम थे। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी इस्लाम की सेवा, सूफी शिक्षाओं के प्रचार और इंसानियत की रहनुमाई में समर्पित कर दी। उनकी खानकाह ज्ञान और आध्यात्मिकता का एक महत्वपूर्ण केंद्र रही, जिससे अनगिनत लोग लाभान्वित हुए।

उनके इंतक़ाल से इल्मी और रूहानी हलकों में एक बड़ा खालीपन पैदा हो गया है, जिसे भर पाना आसान नहीं होगा। उपस्थित लोगों ने उनकी मग़फ़िरत, बुलंद दरजात और उनके परिवार के लिए सब्र की दुआ की।

09/04/2026

ख़्वाजा ए बिहार हज़रत अता हुसैन फ़ानी रहमत उल्लाह अलैह के उर्स के मौक़े पर खानकाह चिश्तिया मुनामिया, गया बिहार में चादर पोशी

वक़्त सुबह का था लगभग 8:45 बजे। हल्की धूप सड़कों पर बिखरी हुई थी और हवा में ताज़गी घुली थी। मैं टहलते हुए अपने ख़यालों म...
08/04/2026

वक़्त सुबह का था लगभग 8:45 बजे। हल्की धूप सड़कों पर बिखरी हुई थी और हवा में ताज़गी घुली थी। मैं टहलते हुए अपने ख़यालों में खोया था कि तभी सामने एक जोड़ा नज़र आया, जो अपने-अपने दफ़्तर जा रहा था।
दोनों साथ-साथ चल रहे थे, मगर उनके बीच एक अनकहा तनाव साफ़ महसूस हो रहा था।
महिला तेज़ क़दमों से आगे बढ़ रही थी, जैसे भीतर कुछ उबल रहा हो। अचानक वह रुकी, मुड़ी और ऊँची आवाज़ में बोली
“इज़्ज़त रास नहीं आती है तुम्हें!”
उसके लहज़े में शिकायत भी थी और नाराज़गी भी।
लड़का कुछ पल चुप रहा। उसने धीमे से सिर झुका लिया, जैसे अपने जज़्बातों को सँभाल रहा हो। फिर बहुत धीमे स्वर में बोला
“और तुम्हें हमारी मोहब्बत...?”
एक ठहराव के बाद उसके होंठों से दर्द रिसा
“जिसे मैं तीस बरस से बेपनाह निभा रहा हूँ...”
उसकी आवाज़ में कोई ग़ुस्सा नहीं था बस एक गहरी थकान, एक सच्चाई, और एक अधूरा-सा सवाल था।
महिला चुप हो गई।
सुबह की वह ताज़गी अब जैसे उनके बीच की ख़ामोशी में खो गई थी। वे फिर चल पड़े एक साथ, मगर अलग-अलग।
कुछ देर मैं वहीं खड़ा रहा, सोचता हुआ
कभी-कभी रिश्ते सुबह की तरह होते हैं उजाले से भरे…
मगर दिलों के बादल उन्हें धुंधला कर देते हैं।

علی لاریجانی: فکر، سیاست اور خودداری کا ایک مکمل استعارہ دنیا کی سیاست میں کچھ شخصیات ایسی ہوتی ہیں جو محض عہدوں اور منا...
19/03/2026

علی لاریجانی: فکر، سیاست اور خودداری کا ایک مکمل استعارہ

دنیا کی سیاست میں کچھ شخصیات ایسی ہوتی ہیں جو محض عہدوں اور مناصب تک محدود نہیں رہتیں بلکہ ایک سوچ، ایک نظریہ اور ایک مستقل رویہ بن جاتی ہیں۔ علی لاریجانی بھی انہی شخصیات میں شمار ہوتے ہیں۔ ان کی زندگی کا سفر پیدائش سے لے کر وفات تک محض ایک سیاسی کہانی نہیں بلکہ علم، فکر، حکمت اور خودداری کا ایک مکمل باب ہے۔

علی لاریجانی 1957 میں نجف (عراق) میں پیدا ہوئے۔ ان کا تعلق ایک علمی اور مذہبی گھرانے سے تھا۔ ان کے والد آیت اللہ میرزا ہاشم آملی ایک معروف عالم دین تھے، جس کی وجہ سے لاریجانی کی تربیت ایک ایسے ماحول میں ہوئی جہاں علم، تحقیق اور فکر کو بنیادی حیثیت حاصل تھی۔ یہی ماحول آگے چل کر ان کی شخصیت کی بنیاد بنا۔

ابتدائی تعلیم کے بعد انہوں نے تہران کی شریف یونیورسٹی آف ٹیکنالوجی سے کمپیوٹر سائنس کی تعلیم حاصل کی۔ لیکن ان کی علمی جستجو یہاں ختم نہیں ہوئی۔ انہوں نے فلسفے، خاص طور پر مغربی فلسفے کے عظیم مفکر Immanuel Kant کے نظریات پر گہری تحقیق کی اور اس پر تین اہم کتابیں لکھیں:

“The Mathematical Method in Kant’s Philosophy”
“Metaphysics and the Exact Sciences in Kant’s Philosophy”
“Intuition and the Synthetic A Priori Judgments in Kant’s Philosophy”

یہ تینوں کتابیں اس بات کا واضح ثبوت ہیں کہ لاریجانی کا ذہن محض سیاسی نہیں بلکہ گہرا فکری اور تحقیقی تھا۔ انہوں نے کانٹ کے پیچیدہ نظریات کو سمجھا ہی نہیں بلکہ انہیں ایک منظم علمی قالب میں پیش بھی کیا۔

یہی وجہ تھی کہ جب وہ عملی سیاست میں آئے تو ان کا انداز عام سیاست دانوں سے مختلف تھا۔ وہ صرف بیانات دینے یا وقتی فیصلے کرنے کے قائل نہیں تھے بلکہ حالات کو سمجھ کر انہیں اپنی سوچ کے مطابق ڈھالنے کی صلاحیت رکھتے تھے۔ 1979 کے ایرانی انقلاب کے بعد انہوں نے مختلف اہم عہدوں پر خدمات انجام دیں، جن میں ایران کے سرکاری نشریاتی ادارے کے سربراہ اور بعد ازاں سپریم نیشنل سیکیورٹی کونسل کے سیکریٹری کے عہدے شامل ہیں۔

بطور چیف نیوکلیئر مذاکرات کار، انہوں نے امریکہ اور دیگر مغربی طاقتوں کے ساتھ ایران کے جوہری پروگرام پر مذاکرات کیے۔ اس دوران ان کا مؤقف ہمیشہ واضح اور مضبوط رہا۔ جب امریکہ نے اپنی شرائط پیش کیں تو ان کا جواب—“قیمتی موتی کے بدلے ٹافی؟”—محض ایک جملہ نہیں بلکہ ایک پوری سوچ کا اظہار تھا۔ یہ اعلان تھا کہ ایران اب دباؤ میں آکر فیصلے نہیں کرے گا بلکہ برابری کی سطح پر بات کرے گا۔

یہی وہ مقام تھا جہاں علی لاریجانی صرف ایک سیاست دان نہیں بلکہ ایک نظریاتی رہنما کے طور پر سامنے آئے۔ انہوں نے ثابت کیا کہ اصل طاقت صرف عسکری یا معاشی نہیں بلکہ فکری بھی ہوتی ہے۔ جو قوم اپنی سوچ میں مضبوط ہو، وہ کسی بھی دباؤ کے سامنے جھکنے پر مجبور نہیں ہوتی۔

2008 میں وہ ایران کی پارلیمنٹ (مجلس) کے اسپیکر منتخب ہوئے اور کئی سال تک اس عہدے پر فائز رہے۔ اس دوران انہوں نے قانون سازی اور پالیسی سازی میں اہم کردار ادا کیا۔ ان کی قیادت میں ایران نے داخلی استحکام کے ساتھ ساتھ خارجی محاذ پر بھی اپنی پوزیشن کو مضبوط کیا۔

چین کے ساتھ 25 سالہ اسٹریٹیجک شراکت داری بھی ان کی دور اندیشی کا نتیجہ تھی۔ انہوں نے عالمی طاقت کے توازن کو سمجھتے ہوئے یہ پیغام دیا کہ اگر مغرب دباؤ ڈالے گا تو ایران مشرق کے ساتھ نئے اتحاد قائم کرے گا۔ یہ ایک ایسی حکمت عملی تھی جس نے دنیا کو یہ سوچنے پر مجبور کیا کہ ایران کو نظر انداز کرنا آسان نہیں۔

ان کی زندگی میں ایک دلچسپ پہلو یہ بھی تھا کہ جس امریکہ کی پالیسیوں کے وہ ناقد تھے، اسی ملک میں ان کی بیٹی ڈاکٹر تھی۔ یہ تضاد نہیں بلکہ ایک توازن تھا—جہاں ذاتی زندگی اور قومی مفادات کو الگ رکھا گیا۔ اس سے یہ سبق ملتا ہے کہ اصولی اختلاف ذاتی دشمنی نہیں ہوتا بلکہ ایک نظریاتی موقف ہوتا ہے۔

17 مارچ 2026 کو اسرائیل کے ایک فضائی حملے میں ان کی وفات کی خبر سامنے آئی۔ یہ واقعہ صرف ایک شخصیت کے خاتمے کا نہیں بلکہ ایک فکری باب کے اختتام کا احساس دلاتا ہے۔ لیکن حقیقت یہ ہے کہ ایسے لوگ جسمانی طور پر رخصت ہو جاتے ہیں، مگر ان کی سوچ، ان کے اصول اور ان کا انداز ہمیشہ زندہ رہتا ہے۔

علی لاریجانی کا سب سے بڑا پیغام یہی تھا “جھکو مت، جھکاؤ”۔ لیکن اس جملے کو صرف سختی یا ضد کے طور پر نہیں سمجھنا چاہیے، بلکہ یہ خودداری، وقار اور فکری مضبوطی کی علامت ہے۔ یہ پیغام ہمیں یہ سوچنے پر مجبور کرتا ہے کہ کیا ہم اپنی پالیسیوں، اپنے فیصلوں اور اپنی اقدار میں اتنے مضبوط ہیں کہ کسی بھی دباؤ کے سامنے ڈٹ سکیں؟

آج کے دور میں جب سیاست اکثر مفادات کے گرد گھومتی ہے اور اصول پس منظر میں چلے جاتے ہیں، علی لاریجانی کی زندگی ایک آئینہ ہے۔ وہ ہمیں یہ سکھاتی ہے کہ اصل قیادت وہ ہے جو علم، بصیرت اور حوصلے پر قائم ہو۔ جو صرف اقتدار کے لیے نہیں بلکہ نظریے کے لیے کھڑی ہو۔

آخر میں سوال وہی رہتا ہے کیا آج ہمارے پاس ایسے رہنما ہیں؟ شاید اس کا جواب آسان نہیں۔ لیکن اگر ہم علی لاریجانی جیسے لوگوں کی زندگی اور فکر سے سبق حاصل کریں تو ممکن ہے کہ ہم ایک ایسے مستقبل کی طرف بڑھ سکیں جہاں جھکنا مجبوری نہیں بلکہ اختیار ہو، اور جہاں قومیں اپنی خودداری کے ساتھ دنیا کے سامنے کھڑی ہو سکیں۔

علی لاریجانی کی زندگی ہمیں یہ سکھاتی ہے کہ اصل طاقت ہتھیاروں میں نہیں بلکہ سوچ میں ہوتی ہے اور یہی وہ میراث ہے جو وہ اپنے پیچھے چھوڑ گئے۔
ٹی ایم ضیاء الحق
بشکریہ: انقلاب
#ایران

हमारे बचपन का रमज़ानरमज़ान हमारे बचपन में सिर्फ इबादत का महीना नहीं था, बल्कि एक पूरा सांस्कृतिक और रूहानी अनुभव था। इसक...
25/02/2026

हमारे बचपन का रमज़ान

रमज़ान हमारे बचपन में सिर्फ इबादत का महीना नहीं था, बल्कि एक पूरा सांस्कृतिक और रूहानी अनुभव था। इसके आते ही माहौल में गंभीरता, घरों में रौनक और दिलों में एक नरमी आ जाती थी। ऐसा लगता था जैसे पूरा मोहल्ला एक ही मकसद के लिए जी रहा हो, अल्लाह की रज़ा हासिल करना।

मेरा बचपन बिहार के शहर गया के मोहल्ला करीमगंज में गुज़रा। शाबान के आख़िरी दिनों से ही रमज़ान की तैयारी शुरू हो जाती थी। घरों में राशन जमा होता, मसाले साफ़ किए जाते और औरतें खास पकवानों की योजना बनातीं। यह तैयारी सिर्फ बाहरी नहीं, बल्कि दिलों की भी होती थी, खुद को बेहतर बनाने की तैयारी।

चांद रात का दृश्य बहुत सुंदर होता था। जैसे ही रमज़ान का चांद दिखाई देता, सब एक-दूसरे को “रमज़ान मुबारक” कहते। उस समय न व्हाट्सऐप था, न सोशल मीडिया, फिर भी खुशी में कोई कमी नहीं होती थी। बच्चे गलियों में दौड़ते और बड़े लोग मस्जिद से लौटकर चांद की खबर देते।

असर के बाद इफ्तार की तैयारी शुरू होती। दस्‍तरख़्वान पर घुगनी (चना), पकौड़े, समोसे, दही बड़े और तरह-तरह के फल सजते। शरबत ज़रूरी होता, कभी रूह अफ़ज़ा, कभी नींबू पानी। उस समय हर घर में फ्रिज नहीं था। गर्मी में मटका और सुराही ही ठंडक का सहारा थे। हम बच्चे बर्फ लेने जाते। लकड़ी के बक्से में बोरी से ढकी बर्फ रखी होती। पचास पैसे किलो के हिसाब से दो-तीन किलो बर्फ लाते और शरबत में डालते तो खुशी दोगुनी हो जाती।

इफ्तार से पहले दरवाज़े पर आवाज़ आती, “इफ्तारी मिलेगी बाजी?”
घर से इफ्तार का हिस्सा निकालकर दिया जाता। हमें बचपन में ही सिखा दिया गया था कि रमज़ान सिर्फ अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए भी जीने का महीना है।

मग़रिब की अज़ान के बाद पहला घूंट पीते ही दिल को सुकून मिलता। फिर ईशा और तरावीह के लिए मस्जिद जाते। मस्जिद में हर वर्ग के लोग एक ही सफ में खड़े होते। यह बराबरी और भाईचारे की खूबसूरत मिसाल थी। तरावीह के बाद अमरती या बनिया मिठाई के रूप में मिलती, जिसकी मिठास देर तक रहती।

सहरी का समय जैसे अलग ही दुनिया था। उस दौर में न मोबाइल थे, न डिजिटल अलार्म। मोहल्ले के चांद शाह नाम के बुज़ुर्ग हाथ में लालटेन और लाठी लेकर निकलते और दरवाज़े खटखटाकर आवाज़ देते,
“रोज़ेदारो! उठ जाओ, सहरी का वक़्त हो गया है!”
उनकी आवाज़ पूरे मोहल्ले को जगा देती।

कभी-कभी नौजवानों के काफिले भी निकलते। रिक्शा पर लाउडस्पीकर लगाकर रात में हम्द, नात और सूफ़ियाना कलाम गाते हुए गलियों से गुजरते। लोग उनकी आवाज़ सुनकर जागते और इंतज़ार भी करते।

एक बार हमने भी तय किया कि हम सहरी का काफिला निकालेंगे। “यूथ लाइब्रेरी” में मिलकर योजना बनाई। रात को हम सब दोस्तों ने मिलकर लाउडस्पीकर का इंतज़ाम किया और करीब दो बजे गली में निकले। एक-एक करके सबने अपनी आवाज़ में हम्द और नात पढ़ी। लोग मुस्कुराकर दरवाज़े खोलकर हमें देखते। वह रात आज भी यादों में रोशनी करती है।

रमज़ान हमारे लिए सिर्फ भूख और प्यास नहीं था, बल्कि अनुशासन और आत्मसंयम का महीना था। समय पर उठना, दिन भर सब्र करना, नमाज़ की पाबंदी करना, यह सब हमें व्यवस्थित जीवन का पाठ पढ़ाता था।

रमज़ान की महानता इसलिए भी है कि कुरआन शरीफ़ इसी महीने में उतरा। इसका पहला अशरा रहमत, दूसरा मग़फिरत और तीसरा जहन्नम से निजात का संदेश देता है। यह महीना हमें खुदपरस्ती से खुदा परस्ती की ओर ले जाता है।

आज समय बदल गया है। आधुनिक सुविधाओं ने जीवन आसान कर दिया है, लेकिन वह सादगी और सामूहिकता कम हो गई है। फिर भी जब रमज़ान आता है, तो दिल के किसी कोने में बचपन की वही गलियां बस जाती हैं, मटके का ठंडा पानी, बर्फ की लाइन, चांद शाह की आवाज़ और हमारे सहरी काफिले की गूंज।

हमारे बचपन का रमज़ान दरअसल एक स्कूल था, नैतिकता, अनुशासन, सब्र और मोहब्बत का स्कूल। उसने हमें सिखाया कि अगर जीवन अल्लाह की रज़ा के मुताबिक हो, तो वह सुकून और मकसद से भर जाता है। समय बदल गया है, मगर रमज़ान की रूह आज भी वही है।

उर्दू दैनिक अवध नामा ने इसे उर्दू में प्रकाशित किया है
T M Zeyaul Haque
#रमज़ान

Bihar’s Kako (Jehanabad) village is building a new identity today, although it has held special importance throughout hi...
17/02/2026

Bihar’s Kako (Jehanabad) village is building a new identity today, although it has held special importance throughout history. Kako is an important center of the Sufi tradition. The shrine of Hazrat Bibi Kamal is located here. She was the daughter of Hazrat Shahabuddin Peer Jagjot and the maternal aunt of Hazrat Makhdoom-e-Jahan Sheikh Sharafuddin Ahmad Yahya Maneri. Because of this spiritual connection, Kako has a strong religious and spiritual identity.

Kako is not only a religious place; it has also produced many good writers and scholars who have brought recognition to the village through their work.

Today, through social media, Kako’s culture, language, and old memories are reaching people across the country and abroad. Syed Asif Imam has played a major role in this. He is an engineer based in Dubai, but through his social media platforms he presents the streets, people, and traditions of Kako to a wider audience.

His 11-year-old son, Izan Asif, has also started a YouTube channel for children, where he shares useful and meaningful content for young viewers. We should all subscribe to his channel and encourage him.

Asif Imam has been our social media friend for a long time, but we met in person for the first time recently. Our childhood friend, Ejaz Sultan, connected us. At that time, Asif was in Jehanabad, and we decided to meet in Patna.

We later visited his home in Patna and met his family as well. He welcomed us with great warmth and respect, for which we sincerely thank him.

This meeting was very special for us. We hope Kako’s identity continues to grow and that Asif Imam and Izan Asif achieve great success along with our heartfelt best wishes.

17/01/2026

जानें बौद्ध गया में कहां मिलती है बेहतरीन बिरयानी

#बौद्ध #बोधगया

بشکریہ اِنقلاب
16/01/2026

بشکریہ اِنقلاب

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